दुनिया की दो सबसे बड़ी ताकतों — अमेरिका और चीन — के बीच चल रही आर्थिक खींचतान अब सिर्फ टैरिफ वॉर तक सीमित नहीं रही. हाल के घटनाक्रमों ने इस टकराव को नए मोर्चे पर ला खड़ा किया है. बीजिंग द्वारा अमेरिकी जहाजों पर शुल्क बढ़ाए जाने के बाद अमेरिका की ओर से जबरदस्त जवाबी कार्रवाई की गई है. ट्रंप प्रशासन ने चीनी सामानों पर 100 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगाने की घोषणा कर दी है, जिससे अब कुल मिलाकर अमेरिका द्वारा लगाए गए टैरिफ 130 प्रतिशत तक पहुंच चुके हैं.
इस फैसले से तिलमिलाए चीन ने भी पलटवार करने में देर नहीं लगाई. बीजिंग ने अमेरिका को निर्यात किए जाने वाले रेयर अर्थ मिनरल्स यानी दुर्लभ धातुओं पर पाबंदियों का ऐलान कर दिया है. इन प्रतिबंधों से अमेरिकी टेक्नोलॉजी और डिफेंस इंडस्ट्री पर असर पड़ सकता है. यह प्रतिक्रिया ट्रंप सरकार के लिए सीधी चुनौती साबित हुई और अब वॉशिंगटन की तरफ से एक और सख्त प्रस्ताव सामने आया है.
हवाई सीमा पर शिकंजा कसने की तैयारी
अमेरिका अब चीन पर हवाई क्षेत्र को लेकर दबाव बनाने की योजना में है. ट्रंप प्रशासन की ओर से तैयार किए गए एक प्रस्ताव के मुताबिक, अमेरिका आने वाले चीनी विमानों को रूसी एयरस्पेस के इस्तेमाल से रोकने का विचार किया जा रहा है. अगर इस प्रस्ताव को मंजूरी मिलती है, तो चीनी एयरलाइनों को अमेरिका पहुंचने के लिए वैकल्पिक, लंबे और महंगे रूट्स का सहारा लेना पड़ेगा, जिससे उनकी ऑपरेशनल लागत में भारी इजाफा होगा.
टिकट दरें, रूट और यात्रियों पर असर
जानकारों का मानना है कि अगर अमेरिका की तरफ से रूसी हवाई क्षेत्र के उपयोग पर यह पाबंदी लागू हो जाती है, तो इसका सीधा असर टिकट की कीमतों और फ्लाइट शेड्यूल पर पड़ेगा. ट्रांस-पैसिफिक रूट्स के लिए उड़ानों की प्लानिंग और टिकट बुकिंग आमतौर पर छह महीने पहले से शुरू हो जाती है. ऐसे में अगर रूट में अचानक बदलाव होता है, तो एयरलाइनों को यात्रियों को मुआवज़ा देना पड़ सकता है या कुछ उड़ानें रद्द करनी पड़ सकती हैं. इससे न केवल ऑपरेशनल खर्च बढ़ेगा, बल्कि कंपनियों की साख पर भी असर पड़ेगा.
अमेरिका की दलील और चीन की प्रतिक्रिया
अमेरिकी परिवहन विभाग का कहना है कि चीनी एयरलाइंस रूसी एयरस्पेस का इस्तेमाल कर अमेरिका तक जल्दी और कम खर्च में पहुंचती हैं, जबकि अमेरिकी विमानन कंपनियों के पास यह विकल्प नहीं है क्योंकि वे रूस के हवाई क्षेत्र से परहेज करती हैं. ऐसे में चीनी कंपनियों को अनुचित लाभ मिल रहा है. अमेरिका इस असंतुलन को खत्म करना चाहता है, लेकिन बीजिंग इस प्रस्ताव को राजनीति से प्रेरित और व्यापारिक प्रतिद्वंद्विता को बढ़ावा देने वाला कदम मान रहा है. ट्रंप प्रशासन के इस रुख से चीन की सत्ताधारी व्यवस्था में भी हलचल मच गई है.चीन और अमेरिका के बीच पहले ही टैरिफ वॉर, टेक्नोलॉजी विवाद और सप्लाई चेन नियंत्रण को लेकर तनाव बना हुआ है. अब हवाई मार्ग को लेकर खिंचती यह नई लकीर दोनों देशों के बीच तनाव को और गहरा कर सकती है. आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह प्रस्ताव केवल दबाव बनाने की रणनीति है या वास्तव में इसे लागू कर अमेरिका चीन को बड़ा झटका देने की तैयारी में है.
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