लालू का मकड़जाल, पॉलिटिक्स में नीतीश का नया प्रयोग... जानें बिहार की राजनीति का केंद्र कैसे बने "सुशासन बाबू"

Bihar Chunav 2025: बिहार की राजनीति को समझने की कोशिश करें, तो सबसे पहले जिस शब्द से आम नागरिक का सामना होता है, वह है, जाति. यह सच है कि दशकों तक बिहार की सियासत में जातिगत समीकरण ही नीतियों और नेतृत्व का आधार रहे हैं.

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Bihar Chunav 2025: बिहार की राजनीति को समझने की कोशिश करें, तो सबसे पहले जिस शब्द से आम नागरिक का सामना होता है, वह है, जाति. यह सच है कि दशकों तक बिहार की सियासत में जातिगत समीकरण ही नीतियों और नेतृत्व का आधार रहे हैं. लालू यादव की आरजेडी ने 1990 के दशक में मुस्लिम-यादव (M-Y) गठजोड़ को गढ़कर एक मजबूत वोट बैंक बनाया और उसी के बल पर सत्ता पर लंबे समय तक काबिज रही. आज भी आरजेडी इस समीकरण को अपनी राजनीतिक रीढ़ मानती है, भले ही तेजस्वी यादव "A to Z" यानी सभी वर्गों की बात करते हों.

लेकिन इसी जाति आधारित राजनीति के बीच एक चेहरा ऐसा भी रहा, जिसने धीरे-धीरे इस धारणा को तोड़ने की कोशिश की — नीतीश कुमार. शुरुआत में वे भी अपने कुर्मी और कोइरी यानी 'लव-कुश' समीकरण के सहारे आगे बढ़े, लेकिन जल्द ही उन्होंने यह समझा कि बिहार जैसे राज्य में लंबे समय तक सत्ता में बने रहने के लिए जाति से ऊपर उठकर सामाजिक संतुलन बनाना जरूरी है. बीते दो दशकों में नीतीश कुमार ने सिर्फ राजनीतिक गठजोड़ ही नहीं किए, बल्कि विकास, कल्याण योजनाओं और सामाजिक समावेश के ज़रिए हर जाति, धर्म और वर्ग में अपनी एक स्वीकार्यता बनाई है.

जातिगत समीकरणों से निकल कर समावेश की राजनीति

नीतीश कुमार का वोट बैंक हमेशा उनकी जाति से बड़ा रहा है. उदाहरण के लिए, जहां कुर्मी और कोइरी समुदाय की संयुक्त आबादी बिहार में 10% से कम है, वहीं जेडीयू को औसतन 15% से 23% तक वोट मिलते रहे हैं. यानी उनके साथ ऐसे वर्ग भी जुड़ते रहे हैं, जो जातिगत समीकरण से नहीं, सरकार की योजनाओं और छवि के आधार पर उन्हें समर्थन देते हैं.

नीतीश ने महादलितों, पसमांदा मुसलमानों, और महिलाओं को खास फोकस में रखकर योजनाएं चलाईं. चाहे वह छात्राओं को साइकिल योजना हो, महिलाओं को आरक्षण, या सामाजिक सुरक्षा पेंशन, नीतीश ने लाभार्थी वर्गों को अपने राजनीतिक आधार में तब्दील कर लिया है.

भाजपा के साथ तालमेल से मिला स्थायित्व

नीतीश कुमार का सबसे स्थायी और लाभकारी राजनीतिक गठबंधन भाजपा के साथ रहा है. चाहे समता पार्टी का दौर हो या 2005 के बाद की सरकारें, भाजपा और जेडीयू का साथ बिहार की राजनीति की धुरी रहा है. भाजपा ने नीतीश को चेहरा बनाकर सत्ता साझा की, और कई बार जब नीतीश की सीटें कम आईं, तब भी उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपी गई, यह गठबंधन धर्म का उदाहरण भी है और नीतीश की अपरिहार्यता का भी.

सीधे लाभ से सीधा वोटर कनेक्शन

नीतीश सरकार की सबसे बड़ी रणनीति रही है, सीधा लाभ, सीधा वोटर कनेक्शन. हालिया उदाहरण देखें तो 125 यूनिट फ्री बिजली योजना और बढ़ी हुई पेंशन राशि ने लगभग 2.25 करोड़ लोगों को सीधा लाभ पहुंचाया है. 7 करोड़ से अधिक मतदाताओं में यह आंकड़ा लगभग एक-तिहाई है, यानी एक ऐसा वोट बैंक जिसे योजनाओं के जरिए जोड़ा गया है.

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