ईरान की ओर रवाना हुआ अमेरिका का एक और एयरक्राफ्ट कैरियर, घातक हथियार और फाइटर जेट तैनात, होगा हमला?

मिडिल ईस्ट में हालात एक बार फिर बेहद तनावपूर्ण होते नजर आ रहे हैं.

Another American Nuclear aircraft carrier leaves for Iran
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मिडिल ईस्ट में हालात एक बार फिर बेहद तनावपूर्ण होते नजर आ रहे हैं. रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका ने ईरान के खिलाफ संभावित सैन्य कार्रवाई से पहले अपना एक और परमाणु-संचालित एयरक्राफ्ट कैरियर ग्रुप इस क्षेत्र की ओर रवाना कर दिया है. 

इसके साथ ही ओपन सोर्स ट्रैकिंग से यह भी सामने आया है कि अमेरिकी एयरफोर्स के कई लड़ाकू विमान मिडिल ईस्ट की दिशा में उड़ान भर रहे हैं. ब्रिटेन और फ्रांस के सैन्य विमानों की बढ़ती गतिविधियों ने भी युद्ध की आशंका को और गहरा कर दिया है.

मिडिल ईस्ट में बढ़ी अमेरिकी सैन्य हलचल

डिफेंस मामलों पर नजर रखने वाली वेबसाइट द वॉर ज़ोन की रिपोर्ट के अनुसार, जब भी मिडिल ईस्ट में हालात बिगड़ते हैं, अमेरिका बड़े पैमाने पर अपने सैन्य संसाधन इस क्षेत्र में भेजता है. कार्गो एयरक्राफ्ट, फाइटर जेट्स और युद्धपोतों की तैनाती आम तौर पर किसी बड़े ऑपरेशन से पहले देखी जाती है. फिलहाल भी कुछ ऐसा ही पैटर्न सामने आ रहा है, जिससे यह सवाल उठने लगा है कि क्या ईरान पर हमला अब तय है.

ट्रंप के बदले सुर, लेकिन शक बरकरार

डोनाल्ड ट्रंप पहले ही ईरान को लेकर कड़े संकेत दे चुके हैं. हालांकि हाल ही में ईरान द्वारा प्रदर्शनकारियों की फांसी की सजा टालने के फैसले के बाद ट्रंप के बयान अपेक्षाकृत नरम नजर आए. व्हाइट हाउस ने भी संकेत दिया है कि फिलहाल सैन्य कार्रवाई को टाल दिया गया है.

लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि यह पहली बार नहीं है. इससे पहले भी ईरान पर हमले से ठीक पहले ट्रंप प्रशासन ने नरमी दिखाई थी और बाद में अचानक सैन्य कदम उठाया गया था. यही वजह है कि मौजूदा बयानों के बावजूद खतरे की आशंका खत्म नहीं हुई है.

हमला क्यों टाल रहा है अमेरिका?

द वॉर ज़ोन के मुताबिक, अमेरिकी मिलिट्री प्लानर्स ने संभावित हमले से पहले और वक्त मांगा है. इसकी बड़ी वजह ईरान की जवाबी सैन्य क्षमता है. माना जा रहा है कि अगर अमेरिका हमला करता है, तो ईरान इजरायल और मिडिल ईस्ट में मौजूद अमेरिकी ठिकानों पर एडवांस बैलिस्टिक मिसाइलों से जवाबी कार्रवाई कर सकता है.

अमेरिका किसी लंबी और लगातार चलने वाली जंग में फंसना नहीं चाहता. उसका मकसद एक ऐसा हमला करना होगा, जिससे हालात तुरंत उसके नियंत्रण में आ जाएं.

क्या ईरान में सत्ता परिवर्तन चाहता है अमेरिका?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या अमेरिका और इजरायल का लक्ष्य ईरान में सत्ता परिवर्तन है. अगर ऐसा है, तो जानकारों का मानना है कि बिना सैन्य कार्रवाई के यह मुमकिन नहीं है.

ईरान में 28 दिसंबर से शुरू हुए विरोध प्रदर्शनों की रफ्तार अब धीमी जरूर पड़ी है, लेकिन हालात अब भी संवेदनशील बने हुए हैं. रिपोर्ट्स के मुताबिक, इन प्रदर्शनों और कार्रवाई में करीब 4000 लोगों की मौत हो चुकी है. ऐसे में अमेरिका के अगले कदम को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है.

हमले की स्थिति में अमेरिका के पास क्या विकल्प?

अगर अमेरिका सैन्य ऑपरेशन का फैसला करता है, तो उसके पास कई विकल्प मौजूद हैं. इसमें ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कॉर्प्स (IRGC) और बासिज पैरामिलिट्री फोर्स पर एक साथ बड़ा हमला, ईरान के शीर्ष नेतृत्व को निशाना बनाना या फिर उसके परमाणु ठिकानों पर दोबारा स्ट्राइक शामिल हो सकती है. इसके अलावा ईरान की जवाबी क्षमता को कमजोर करने के लिए उसके मिसाइल कारखानों और अंडरग्राउंड सैन्य ठिकानों पर हमला भी किया जा सकता है.

नेतन्याहू की चेतावनी और इजरायल की चिंता

कुछ रिपोर्ट्स में यह दावा भी किया गया है कि इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने ट्रंप से ईरान पर हमला न करने का आग्रह किया है. इसकी वजह पिछले साल जून में हुआ टकराव बताया जा रहा है, जब ईरान की कम से कम 50 एडवांस बैलिस्टिक मिसाइलें इजरायल में गिरी थीं और भारी नुकसान हुआ था. इजरायल को डर है कि अगर फिर से युद्ध हुआ, तो ईरान इस बार और ज्यादा ताकत के साथ जवाब देगा.

अमेरिका की सैन्य ताकत और उसकी सीमाएं

फिलहाल अमेरिका के पास मिडिल ईस्ट में करीब 30,000 सैनिक, छह युद्धपोत और बड़ी संख्या में टैक्टिकल एयरक्राफ्ट तैनात हैं. इसके बावजूद रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका ईरान के खिलाफ किसी लंबे और व्यापक सैन्य अभियान के लिए पूरी तरह तैयार नहीं है.

डिफेंस एक्सपर्ट टायलर रोगोवे ने X पर लिखा है कि मिडिल ईस्ट में अमेरिका के पास इतने संसाधन नहीं हैं कि ईरान में कुछ बड़ा करने के लिए एक निरंतर सैन्य अभियान चलाया जा सके.

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