भारत और आर्मेनिया के बीच रक्षा सहयोग एक नए स्तर पर पहुंचने जा रहा है. सूत्रों के अनुसार, दोनों देशों के बीच 2.5 से 3 अरब डॉलर की संभावित रक्षा डील पर सहमति बन चुकी है. इस समझौते के तहत भारत की सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) आर्मेनिया को सुखोई Su-30MKI लड़ाकू विमान की आपूर्ति करेगी.
यह डील न केवल आर्मेनिया के इतिहास की सबसे बड़ी रक्षा खरीद होगी बल्कि दक्षिण कॉकस क्षेत्र में शक्ति संतुलन को भी प्रभावित करेगी.
2027 तक होगी आपूर्ति की शुरुआत
रक्षा सूत्रों का कहना है कि समझौते पर तकनीकी और वित्तीय पहलुओं पर अंतिम दौर की बातचीत जारी है. विमान की डिलीवरी 2027 तक शुरू होने की संभावना है. इस डील में विमान के साथ-साथ एडवांस वेपन पैकेज, स्पेयर पार्ट्स और पायलट ट्रेनिंग मॉड्यूल भी शामिल रहेंगे.
यह समझौता भारत और आर्मेनिया के बीच 2020 के नागोर्नो-कराबाख युद्ध के बाद तेजी से बढ़ते रक्षा रिश्तों का विस्तार है. दोनों देशों ने पहले भी पिनाका रॉकेट सिस्टम, स्वदेशी रडार और गोला-बारूद आपूर्ति जैसे समझौतों पर काम किया है.
अज़रबैजान और पाकिस्तान के लिए संदेश
विशेषज्ञों का मानना है कि यह डील अज़रबैजान–पाकिस्तान रक्षा गठजोड़ के जवाब के रूप में देखी जा रही है. अज़रबैजान ने हाल ही में पाकिस्तान से 40 JF-17C Block-III लड़ाकू विमान खरीदने का करार किया है, जबकि पाकिस्तान इस्लामी सहयोग संगठन (OIC) और सैन्य मंचों पर लगातार अज़रबैजान के पक्ष में खड़ा रहा है.
ऐसे में भारत और आर्मेनिया का यह सहयोग कॉकस क्षेत्र में नए सामरिक समीकरण बना सकता है.
HAL बनाएगा SU-30MKI का ‘कस्टम वर्जन’
भारत की सरकारी एयरोस्पेस कंपनी HAL आर्मेनिया के लिए विशेष रूप से अनुकूलित (Customized) Su-30MKI Export Variant तैयार करेगी.
इन विमानों में भारत द्वारा विकसित ‘उत्तम AESA रडार’ लगाया जाएगा, जो लंबी दूरी पर दुश्मन के विमानों और मिसाइलों को ट्रैक करने में सक्षम है.
साथ ही इसमें होंगे —
इन सभी सुविधाओं के साथ यह सुखोई का अब तक का सबसे एडवांस एक्सपोर्ट मॉडल माना जा रहा है.
SU-30MKI: भारत की हवाई शक्ति की रीढ़
भारतीय वायुसेना में सुखोई-30MKI की तैनाती वर्ष 2002 से है. इसे रूस की सुख़ोई डिज़ाइन ब्यूरो और HAL ने संयुक्त रूप से विकसित किया था. यह मल्टी-रोल फाइटर जेट है, जो हवा से हवा, हवा से जमीन और समुद्र पर भी हमला करने की क्षमता रखता है.
इसमें दो शक्तिशाली AL-31FP टर्बोफैन इंजन लगे हैं, जो इसे ‘थ्रस्ट वेक्टरिंग’ यानी हवा में त्वरित दिशा परिवर्तन की क्षमता देते हैं.
विमान 8,000 किलोग्राम तक हथियार ले जा सकता है और इसमें ब्रह्मोस सुपरसोनिक मिसाइल लगाने की भी सुविधा है.
इसकी अधिकतम रफ्तार Mach 2 (लगभग 2,120 किमी/घंटा) है और यह 3,000 किलोमीटर से अधिक दूरी तक उड़ान भर सकता है.
‘सुपर सुखोई’ कार्यक्रम से बढ़ी क्षमता
भारत ने हाल के वर्षों में सुखोई को और अधिक घातक बनाने के लिए ‘सुपर सुखोई’ आधुनिकीकरण कार्यक्रम शुरू किया है.
इस कार्यक्रम के तहत —
इस अपग्रेड के बाद भारत इन विमानों को निर्यात के लिए भी आकर्षक बना पाया है. HAL ने इसके एक्सपोर्ट संस्करण को विशेष रूप से ‘फ्रेंडली नेशंस’ के लिए तैयार किया है.
भारत-आर्मेनिया रक्षा सहयोग का दायरा
आर्मेनिया उन कुछ देशों में से एक है जिसने खुले तौर पर भारत से रक्षा सहयोग की मांग की है. 2022 में भारत ने आर्मेनिया को स्वदेशी ‘पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम’, एंटी-टैंक मिसाइलें और गोला-बारूद निर्यात किया था. इन सौदों ने दोनों देशों के बीच विश्वास और रणनीतिक तालमेल को मजबूत किया.
अब सुखोई डील से आर्मेनिया की वायुसेना को आधुनिक तकनीक मिलेगी और भारत को ‘डिफेंस एक्सपोर्ट हब’ बनने की दिशा में नई सफलता मिलेगी.
पाकिस्तान और अज़रबैजान की बढ़ी चिंता
रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, यह सौदा न केवल क्षेत्रीय सैन्य संतुलन को प्रभावित करेगा बल्कि पाकिस्तान और अज़रबैजान की रणनीतिक योजनाओं पर भी असर डालेगा.
JF-17C विमान अभी भी अपने परीक्षण चरणों से गुजर रहे हैं, जबकि सुखोई-30MKI प्रमाणित और युद्ध-तैयार प्लेटफॉर्म है. इससे अज़रबैजान और पाकिस्तान की संयुक्त वायु शक्ति के मुकाबले आर्मेनिया को बेहतर डिटरेंस (Deterrence) क्षमता मिल सकती है.
भारत के लिए कूटनीतिक और आर्थिक फायदा
यह सौदा भारत के लिए कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है —
रक्षा निर्यात को बढ़ावा: भारत का लक्ष्य 2025 तक 5 अरब डॉलर का रक्षा निर्यात करना है. यह डील उस दिशा में बड़ा कदम होगी.
‘मेक इन इंडिया’ की सफलता: HAL द्वारा निर्मित ये विमान भारत की स्वदेशी रक्षा उत्पादन क्षमता को दर्शाएंगे.
कूटनीतिक प्रभाव: इस डील से भारत दक्षिण कॉकस क्षेत्र में एक भरोसेमंद साझेदार के रूप में उभर सकता है, जो रूस और यूरोप के बीच सामरिक सेतु की तरह है.
रूस की भूमिका और अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया
सुखोई-30MKI मूल रूप से रूस के Su-30 प्लेटफॉर्म पर आधारित है, लेकिन भारतीय संस्करण में 60% से अधिक तकनीक स्वदेशी है.
रूस ने इस डील को ‘मित्र राष्ट्रों के बीच सकारात्मक रक्षा सहयोग’ बताया है. वहीं पश्चिमी विश्लेषक मानते हैं कि भारत यह दिखा रहा है कि वह अब केवल हथियार खरीदने वाला देश नहीं, बल्कि ‘नेट एक्सपोर्टर ऑफ एडवांस्ड डिफेंस टेक्नोलॉजी’ बन चुका है.
ये भी पढ़ें- ज्वेलरी, कपड़े, सी प्रोडक्ट्स... अमेरिकी टैरिफ के बाद इन देशों ने किया भारत का वेलकम, बढ़ा एक्सपोर्ट