साल 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए भीषण सांप्रदायिक दंगों से जुड़े कथित “बड़ी साजिश” मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है. इस फैसले में छात्र नेता उमर खालिद और शरजील इमाम को बड़ा झटका लगा है, क्योंकि शीर्ष अदालत ने उनकी जमानत याचिकाएं खारिज कर दी हैं. वहीं, इसी मामले में नामजद अन्य सात आरोपियों को कोर्ट ने जमानत देने का आदेश दिया है.
यह फैसला जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन. वी. अंजारिया की पीठ ने सुनाया. अदालत ने गुलफिशा फ़ातिमा, मीरान हैदर, शिफा-उर-रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद समेत अन्य आरोपियों को राहत दी, लेकिन उमर खालिद और शरजील इमाम के मामले को उनसे अलग माना.
लंबी हिरासत अपने-आप में जमानत का आधार नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि आरोपी भले ही लंबे समय से न्यायिक हिरासत में हों, लेकिन केवल देरी को “जमानत पाने का हथियार” नहीं बनाया जा सकता. कोर्ट ने कहा कि हर आरोपी की भूमिका को अलग-अलग तरीके से परखना जरूरी है.
पीठ ने गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी यूएपीए की धारा 43डी(5) का उल्लेख करते हुए कहा कि यह प्रावधान सामान्य जमानत नियमों से अलग है. हालांकि, इसका यह मतलब नहीं है कि अदालतें बिना जांच के जमानत से इनकार कर दें. अदालत को यह देखना होता है कि आरोप प्रथम दृष्टया सही प्रतीत होते हैं या नहीं.
“आतंकी कृत्य सिर्फ हिंसा तक सीमित नहीं”
अदालत ने अपने अवलोकन में कहा कि आतंकवादी गतिविधियों की परिभाषा केवल शारीरिक हिंसा तक सीमित नहीं है. आवश्यक सेवाओं में बाधा डालना, सार्वजनिक व्यवस्था को अस्त-व्यस्त करना और देश की अर्थव्यवस्था के लिए खतरा पैदा करना भी इसके दायरे में आता है.
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी दोहराया कि जमानत का चरण बचाव पक्ष के पूरे मूल्यांकन का मंच नहीं होता, लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि अदालत आंख मूंदकर आरोप स्वीकार कर ले. न्यायिक संयम का अर्थ कर्तव्य से पीछे हटना नहीं है.
उमर खालिद और शरजील इमाम की भूमिका अलग?
कोर्ट ने साफ कहा कि सभी आरोपी एक समान स्थिति में नहीं हैं. उपलब्ध सामग्री के आधार पर उमर खालिद और शरजील इमाम की भूमिका अन्य आरोपियों से अलग नजर आती है. अदालत ने सवाल उठाया कि क्या जांच से प्रथम दृष्टया अपराध बनता है और क्या आरोपी की भूमिका का कथित अपराध से सीधा संबंध दिखाई देता है.
इसी आधार पर कोर्ट ने दोनों को जमानत देने से इनकार कर दिया, जबकि अन्य आरोपियों को सशर्त रिहाई का लाभ दिया गया.
दोनों पक्षों की दलीलें और सुनवाई का क्रम
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पिछले वर्ष 10 दिसंबर को सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था. दिल्ली पुलिस की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस. वी. राजू ने पक्ष रखा. वहीं, आरोपियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ताओं कपिल सिब्बल, अभिषेक सिंघवी, सिद्धार्थ दवे, सलमान खुर्शीद और सिद्धार्थ लूथरा ने जमानत के समर्थन में दलीलें दीं.
उमर खालिद और शरजील इमाम पर लगे आरोप
दिल्ली पुलिस के अनुसार, उमर खालिद, शरजील इमाम और अन्य सह-आरोपी फरवरी 2020 में हुए उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों के “मुख्य साजिशकर्ता” थे. पुलिस का दावा है कि इन दंगों को सुनियोजित तरीके से अंजाम दिया गया.
इन सभी के खिलाफ यूएपीए और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की कई धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है. आरोप है कि इन्होंने हिंसा भड़काने और विरोध प्रदर्शनों की आड़ में दंगे कराने की साजिश रची.
बचाव पक्ष की दलील: पांच साल, फिर भी ट्रायल शुरू नहीं
जमानत की मांग करते हुए बचाव पक्ष ने मुख्य रूप से ट्रायल में हो रही अत्यधिक देरी का मुद्दा उठाया. वकीलों ने अदालत को बताया कि आरोपी पांच वर्षों से अधिक समय से जेल में हैं, जबकि अब तक मुकदमे की सुनवाई शुरू नहीं हो पाई है.
बचाव पक्ष का कहना था कि इतने लंबे समय में भी ऐसा कोई ठोस सबूत सामने नहीं आया है, जिससे यह साबित हो सके कि आरोपियों ने प्रत्यक्ष रूप से हिंसा को अंजाम दिया या दंगों को भड़काया.
दिल्ली पुलिस का जवाब: “देश को अस्थिर करने की साजिश”
दिल्ली पुलिस ने जमानत याचिकाओं का कड़ा विरोध किया. पुलिस के अनुसार, यह मामला केवल स्थानीय दंगों का नहीं, बल्कि राज्य को अस्थिर करने की एक व्यापक और संगठित साजिश का हिस्सा है.
पुलिस ने दावा किया कि ये विरोध प्रदर्शन अचानक नहीं हुए, बल्कि यह एक “पैन-इंडिया” योजना थी, जिसका उद्देश्य सरकार पर दबाव बनाना, अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की छवि को नुकसान पहुंचाना और देश को आर्थिक रूप से कमजोर करना था.
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