बांग्लादेश, जो भारत की मदद से अपनी आजादी हासिल कर सका, हमेशा से ही सांस्कृतिक और धार्मिक विविधता का प्रतीक रहा है. लेकिन हाल के वर्षों में वहां रहने वाले हिंदू समुदाय की स्थिति चिंता का विषय बनी हुई है. 2024 में शेख हसीना सरकार के खिलाफ दंगे और हिंसा के बाद हिंदू अल्पसंख्यकों पर हुए अत्याचार ने अंतरराष्ट्रीय ध्यान खींचा. इस बीच भारत और दुनिया ने वहां की घटनाओं पर अपनी प्रतिक्रिया जाहिर की.
इसी पृष्ठभूमि में, बांग्लादेश में शनिवार को जन्माष्टमी का त्योहार मनाया गया. इस अवसर पर बांग्लादेशी सेना के प्रमुख सहित उच्च सैन्य अधिकारी भी समारोह में शामिल हुए, जो यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के प्रति सरकार और सेना सजग हैं.
सेना प्रमुख ने दी सुरक्षा और सद्भाव की गारंटी
राजधानी ढाका में आयोजित मुख्य समारोह में, सेना प्रमुख जनरल वकर-उज-जमान, नौसेना प्रमुख एडमिरल एम नजमुल हसन, और वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल हसन महमूद खान ने भाग लिया.समारोह की शुरुआत गीत-संगीत और नृत्य से हुई. जुलूस शुरू होने से पहले समुदाय के नेताओं ने सेना प्रमुखों का स्वागत किया. अपने संबोधन में जनरल वकर-उज-जमान ने कहा, "मैं आभारी हूं कि आपने हमें इस उत्सव में शामिल होने का मौका दिया. बांग्लादेश में सभी धर्मों और समुदायों के लोगों के समान अधिकार हैं. सशस्त्र बल हमेशा शांति, सुरक्षा और सद्भाव बनाए रखने के लिए नागरिकों के साथ खड़े रहेंगे."
बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों की स्थिति
बांग्लादेश में हिंदू समुदाय की कुल जनसंख्या लगभग 8-9 फीसदी है, जो पहले की तुलना में कम हो गई है. इसका मुख्य कारण जबरन धर्म परिवर्तन, संपत्ति पर कब्जा, धार्मिक हिंसा और सामाजिक भेदभाव माना जाता है. कई हिंदू परिवारों को अपनी जमीन और संपत्ति छोड़कर देश छोड़ना पड़ा है. हालांकि सरकार ने अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए कानून बनाए हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर इन कानूनों का प्रभाव सीमित दिखता है. कुछ क्षेत्रों में सांप्रदायिक सौहार्द बना हुआ है, लेकिन हिंसा की घटनाएं अब भी सामने आती रहती हैं. ऐसे में सेना प्रमुख की उपस्थिति और सुरक्षा का भरोसा बांग्लादेशी हिंदू समुदाय के लिए एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है.
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