जैश-ए-मोहम्मद के फरीदाबाद-सहारनपुर मॉड्यूल की जांच में एक बड़ा खुलासा हुआ है. जांच एजेंसियों के मुताबिक, इस मॉड्यूल के आरोपी डॉक्टर मुज़म्मिल और डॉक्टर उमर ने दिल्ली और अन्य संवेदनशील इलाकों में हमले की योजना बनाने के लिए विदेशी हैंडलरों से संपर्क करने हेतु एनक्रिप्टेड मैसेंजर ऐप 'सेशन' का इस्तेमाल किया.
'सेशन' ऐप की खासियत यह है कि इसमें मोबाइल नंबर की जरूरत नहीं होती, और चैट का मेटाडेटा सेव नहीं होता, जिससे बातचीत पूरी तरह सुरक्षित रहती है.
तुर्की क्यों बनी बैठक का केंद्र
जांच में सामने आया कि डॉक्टर मुज़म्मिल और डॉक्टर उमर ने अपने हैंडलरों से मिलने और योजनाओं पर चर्चा करने के लिए तुर्की का चयन किया था. शुरुआती संपर्क में हैंडलर अपने छद्म नाम 'अबू उकसा' का इस्तेमाल करता था और उसका नंबर तुर्की का वर्चुअल नंबर था.
जांच अधिकारियों के मुताबिक, यह योजना इसलिए बनाई गई थी ताकि किसी भी तरह से भारत या पाकिस्तान की सुरक्षा एजेंसियों को इस बैठक की भनक न लगे. विदेश में बैठक के दौरान उन्हें विस्फोटक तकनीक, लक्ष्य स्थलों की रेकी और हमले की रणनीति पर प्रशिक्षण दिया गया.
डिजिटल नेटवर्क और सोशल मीडिया
जांच में यह भी सामने आया कि डॉक्टरों का यह मॉड्यूल दो प्रमुख टेलीग्राम ग्रुपों से जुड़ा हुआ था –
इन ग्रुपों में जैश-ए-मोहम्मद से संबंधित संदेश, मौलाना मसूद अजहर के पुराने बयान और जिहाद को बढ़ावा देने वाली सामग्री साझा की जाती थी. एजेंसियों का मानना है कि यह ग्रुप आतंकवादियों की ऑनलाइन गतिविधियों और रिक्रूटमेंट के लिए सक्रिय थे.
जांच एजेंसियों की कार्रवाई
फरीदाबाद और सहारनपुर पुलिस ने इस मॉड्यूल की पहचान कर गिरफ्तारी और पूछताछ की कार्रवाई की. आरोपी डॉक्टरों के कब्जे से डिजिटल डेटा, मोबाइल और अन्य उपकरण बरामद किए गए हैं.
जांच एजेंसियों ने इस बात पर भी जोर दिया कि विदेशी हैंडलरों और मॉड्यूल के बीच सुरक्षित डिजिटल संवाद आतंकवादियों को लंबे समय तक छिपे रहने में मदद करता है.
खतरा और भविष्य की तैयारी
विशेषज्ञों का कहना है कि एनक्रिप्टेड ऐप्स और वर्चुअल नंबर का इस्तेमाल आधुनिक आतंकवादियों के लिए बेहद खतरनाक साबित हो रहा है. इसके जरिए वे योजनाओं को दुनिया के किसी भी हिस्से से संचालित कर सकते हैं, जिससे सुरक्षा एजेंसियों के लिए समय पर रोकथाम करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है.
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