बिहार की राजनीति में जहां जातीय समीकरण, गठबंधन और दल-बदल चर्चा में रहते हैं, वहीं 2025 के विधानसभा चुनाव में पूर्वी चंपारण और शिवहर के कुछ विधानसभा सीटों पर एक नया और दिलचस्प अध्याय सामने आ रहा है, राणा परिवार की राजनीतिक लड़ाई, जिसमें दो सगे भाई विपरीत दलों के उम्मीदवार बनकर आमने-सामने खड़े हैं.
यह पूरा मामला जुड़ा है बिहार के कद्दावर नेता स्वर्गीय सीताराम सिंह के परिवार से. सीताराम सिंह कभी राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के अहम चेहरा थे. उन्होंने 1985 से लेकर 2004 तक लगातार सात बार मधुबन विधानसभा सीट से जीत हासिल की और कई बार बिहार सरकार में मंत्री भी रहे. बाद में वे सांसद भी बने. उनके निधन के बाद उनके दोनों बेटों ने राजनीति में अपने-अपने रास्ते चुने और अब ये रास्ते एक-दूसरे के आमने-सामने आ खड़े हुए हैं.
राणा रणधीर सिंह- बीजेपी के दिग्गज
राणा परिवार के बड़े पुत्र राणा रणधीर सिंह, वर्तमान में मधुबन विधानसभा सीट से भाजपा विधायक हैं. वह लगातार तीसरी बार इस सीट से जीत दर्ज करने की कोशिश में हैं. राणा रणधीर को भाजपा और आरएसएस के साथ करीबी संबंधों के लिए जाना जाता है. वह राज्य सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं और मधुबन क्षेत्र में उनकी पकड़ मजबूत मानी जाती है.
रणधीर सिंह ने अपने पिता की राजनीतिक विरासत को भाजपा के रंग में ढालते हुए आगे बढ़ाया और अब वे शिवहर लोकसभा क्षेत्र में भाजपा की राजनीति का चेहरा बन चुके हैं.
राणा रंजीत सिंह- AIMIM से नई पारी
दूसरी तरफ, राणा रणधीर सिंह के छोटे भाई राणा रंजीत सिंह ने राजनीति में बिल्कुल अलग रास्ता चुना है. 2025 के चुनाव में उन्होंने ढाका विधानसभा सीट (जिला - पूर्वी चंपारण) से AIMIM (ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन) के टिकट पर चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है.
रंजीत सिंह इससे पहले 2019 के लोकसभा चुनाव में शिवहर सीट से AIMIM के टिकट पर किस्मत आजमा चुके हैं, लेकिन उन्हें जीत नहीं मिली थी. हालांकि उस चुनाव ने यह साफ कर दिया कि रंजीत अब भाजपा की राजनीति के खिलाफ खड़े हैं, चाहे सामने अपने बड़े भाई ही क्यों न हों.
नामांकन में दिखा अनोखा प्रतीकवाद
जब राणा रंजीत सिंह ने ढाका सीट से नामांकन भरा, तो उनकी पोशाक और प्रतीकों ने सबका ध्यान खींचा.
इस पहनावे के जरिए उन्होंने समावेशी राजनीति का संदेश देने की कोशिश की, जो AIMIM की आमतौर पर छवि से थोड़ा अलग माना जा रहा है. उन्होंने कहा, “मैं जाति-धर्म से ऊपर उठकर सबको साथ लेकर चलने की बात कर रहा हूं. समाज की एकजुटता ही मेरी राजनीति की दिशा है.”
ढाका सीट पर सीधा मुकाबला
ढाका विधानसभा सीट, जो पूर्वी चंपारण जिले में आती है, इस बार बेहद हाई-प्रोफाइल हो गई है क्योंकि यहां अब मुकाबला है:
भाजपा जहां अपनी सरकार के काम और विकास के मुद्दे को आगे रख रही है, वहीं AIMIM खासकर रंजीत सिंह जातीय समीकरण, पिछड़े और अल्पसंख्यक वोटों के सहारे खुद को विकल्प के तौर पर पेश कर रहे हैं.
परिवार में राजनीतिक दरार कब आई?
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, 2019 के लोकसभा चुनाव में ही दोनों भाइयों की राजनीतिक राहें अलग हो गई थीं.
यहीं से राणा परिवार में वैचारिक और राजनीतिक दरार साफ नजर आने लगी थी, जो अब ढाका बनाम मधुबन की चुनावी जंग में पूरी तरह सार्वजनिक हो चुकी है.
जातीय समीकरण और राजनीतिक प्रभाव
रंजीत सिंह, AIMIM में होने के बावजूद मुस्लिम-पिछड़ा समीकरण के साथ-साथ भूमिहार वोटों में भी सेंध लगाने की कोशिश कर रहे हैं.
उनकी उम्मीद यह भी है कि उनके पिता की राजनीतिक विरासत और नाम अब भी क्षेत्र में एकजुटता और भावनात्मक अपील रखते हैं.
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