वॉशिंगटन/नई दिल्ली: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा अपनाई गई टैरिफ नीति एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में है. भारत, चीन, रूस और ब्राजील जैसे बड़े देशों के खिलाफ भारी-भरकम व्यापारिक शुल्क लगाने की योजना ने ब्रिक्स समूह के भीतर एक नया समीकरण बना दिया है. विशेषज्ञों का मानना है कि इस स्थिति में BRICS (ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका) न सिर्फ एक आर्थिक मंच बन कर उभर रहा है, बल्कि यह अमेरिका की वर्चस्ववादी नीतियों के खिलाफ एक संगठित वैश्विक प्रतिरोध के रूप में खड़ा हो रहा है.
डोनाल्ड ट्रंप की नई टैरिफ नीति ने अमेरिका के पुराने साझेदारों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है. जहां पहले भारत और अमेरिका के रिश्तों को लेकर बड़ी उम्मीदें थीं, वहीं अब भारत जैसे देशों को आर्थिक और रणनीतिक स्वतंत्रता की दिशा में नए कदम उठाने की आवश्यकता महसूस हो रही है और यही वह बिंदु है जहां BRICS की भूमिका निर्णायक बनती जा रही है.
टैरिफ के खिलाफ मजबूत हो रही BRICS की दीवार
ट्रंप प्रशासन द्वारा भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और चीन जैसे देशों पर भारी शुल्क लगाने की घोषणा ने इन देशों के बीच रणनीतिक एकजुटता को मजबूती दी है. उदाहरण के लिए:
ट्रंप का तर्क है कि यह कदम अमेरिका के व्यापार घाटे को कम करने और डॉलर की वैश्विक स्थिति को मजबूत बनाए रखने के लिए जरूरी है. लेकिन आलोचकों का कहना है कि यह नीति अमेरिका को उसके साझेदारों से दूर कर देगी, और खुद अमेरिका की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाएगी.
भारत की बदलती सोच: रूस और चीन के करीब?
ट्रंप की टैरिफ नीति के बाद भारत का झुकाव BRICS के भीतर ज्यादा सक्रियता की ओर बढ़ रहा है. हाल ही में:
इन घटनाओं से यह साफ संकेत मिलता है कि भारत अपने पारंपरिक अमेरिकी संबंधों के साथ-साथ ब्रिक्स के नए शक्ति-संतुलन का भी हिस्सा बनना चाहता है. यह भारत की गैर-पक्षीय रणनीति का नया रूप हो सकता है, जिसमें वह पश्चिम और पूर्व दोनों धड़ों के साथ अपने हितों को संतुलित करने की कोशिश कर रहा है.
डॉलर की बादशाहत को चुनौती: ब्रिक्स का एजेंडा
BRICS लंबे समय से अमेरिकी डॉलर पर अत्यधिक निर्भरता को चुनौती देने की योजना बना रहा है. चीन और रूस ने तो पहले ही आपसी व्यापार में स्थानीय मुद्राओं का उपयोग शुरू कर दिया है, और अब भारत भी इस दिशा में कदम बढ़ा रहा है.
ब्रिक्स की योजना है:
यदि यह प्रक्रिया सफल होती है, तो डॉलर की वैश्विक पकड़ पर गहरा असर पड़ सकता है. ट्रंप का डर भी यही है, और उन्होंने इस बारे में सार्वजनिक रूप से कहा कि "ब्रिक्स डॉलर को कमजोर करने की साजिश रच रहा है, और भारत उसका हिस्सा है."
ब्राजील और ट्रंप के रिश्ते: राजनीतिक पेचीदगियां
ब्राजील पर लगाए गए टैरिफ को लेकर विश्लेषकों का कहना है कि इसका मुख्य कारण आर्थिक नहीं बल्कि राजनीतिक है. ट्रंप के करीबी माने जाने वाले ब्राजील के पूर्व राष्ट्रपति जैर बोल्सोनारो पर संसद पर हमले का आरोप है. ब्राजील की न्यायपालिका उन पर मुकदमा चला रही है. ट्रंप इन कार्रवाइयों को व्यक्तिगत रूप से देख रहे हैं और इसी वजह से ब्राजील को निशाना बनाया गया है.
वर्तमान राष्ट्रपति लुला दा सिल्वा ने इस कदम की कड़ी आलोचना करते हुए ट्रंप को बातचीत के लिए फोन करने से इनकार कर दिया. इसके विपरीत, उन्होंने मोदी और जिनपिंग से बातचीत की और इसे "वैश्विक दक्षिण की एकता" बताया.
अमेरिका के अंदर से उठ रही आवाजें
ट्रंप की टैरिफ नीति को अमेरिका के भीतर भी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है.
प्रसिद्ध अर्थशास्त्री जेफरी सैक्स ने चेतावनी दी है कि यह नीति अमेरिका को वैश्विक अर्थव्यवस्था से अलग-थलग कर सकती है.
पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन ने भारत पर टैरिफ लगाने को लेकर कहा कि यह अमेरिका की 25 वर्षों की भारत नीति को खतरे में डाल देगा.
सीएनएन के वरिष्ठ पत्रकार फरीद ज़कारिया का कहना है कि भारत के साथ ट्रंप ने जो किया है, उसके बाद भारत दोबारा अमेरिका पर वैसे भरोसा नहीं करेगा.
क्या अमेरिका खुद को अलग कर रहा है?
वर्तमान वैश्विक राजनीति अब बहुध्रुवीय होती जा रही है. अमेरिका का लंबे समय से चला आ रहा ‘अकेला सुपरपावर’ मॉडल अब हर जगह चुनौती झेल रहा है चाहे वो आर्थिक मोर्चा हो, तकनीकी हो या सामरिक.
ब्रिक्स के बढ़ते प्रभाव और चीन-भारत जैसे देशों की बढ़ती आत्मनिर्भरता, अमेरिका की रणनीति को अप्रभावी बना सकती है. ट्रंप की आक्रामक टैरिफ नीति इस प्रक्रिया को और तेज कर सकती है.
ये भी पढ़ें- भारत को मिला सबसे घातक बॉम्बर का ऑफर, इसके रेंज में होगा चीन-पाकिस्तान का हर कोना! जानें इसकी ताकत