लंदन: मध्य पूर्व में दशकों से चले आ रहे संघर्ष की पृष्ठभूमि में एक ऐतिहासिक घटनाक्रम सामने आया है. ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया ने रविवार को फिलिस्तीन को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में औपचारिक मान्यता देने की घोषणा की है. यह कदम न केवल पश्चिमी देशों की कूटनीति में एक बड़ा मोड़ माना जा रहा है, बल्कि इज़रायल-फिलिस्तीन संघर्ष की दिशा भी बदल सकता है.
यह फैसला ऐसे समय पर लिया गया है जब गाजा पट्टी में इज़रायल की सैन्य कार्रवाई में हज़ारों लोग जान गंवा चुके हैं और मानवीय संकट लगातार गहराता जा रहा है. साथ ही, यह निर्णय उस समय आया है जब संयुक्त राष्ट्र महासभा का सत्र शुरू होने वाला है, जहां इस मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय बहस और चर्चा की संभावना जताई जा रही है.
क्यों खास है यह मान्यता?
फिलिस्तीन को स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता देना केवल एक औपचारिक कूटनीतिक बयान नहीं है. यह एक ऐसे संघर्ष में हस्तक्षेप की प्रतीक है जो सदी से भी अधिक समय से चला आ रहा है.
इसके दूरगामी असर हो सकते हैं:
ब्रिटेन ने क्या कहा?
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने अपने बयान में कहा कि यह फैसला इज़रायल के खिलाफ कोई दंडात्मक कदम नहीं है, बल्कि यह एक प्रयास है ताकि शांति को मौका मिल सके. उन्होंने कहा, "यह मान्यता इज़रायल को सज़ा देने के लिए नहीं, बल्कि फिलिस्तीनी लोगों की आत्मनिर्भरता और क्षेत्रीय स्थिरता को बढ़ावा देने के लिए दी जा रही है."
Today, to revive the hope of peace for the Palestinians and Israelis, and a two state solution, the United Kingdom formally recognises the State of Palestine. pic.twitter.com/yrg6Lywc1s
— Keir Starmer (@Keir_Starmer) September 21, 2025
ब्रिटेन के डिप्टी प्रधानमंत्री डेविड लैमी ने स्पष्ट किया कि फिलिस्तीन को मान्यता देने का यह मतलब नहीं कि वह तुरंत एक संप्रभु राष्ट्र के तौर पर स्थापित हो जाएगा. यह केवल एक प्रक्रिया की शुरुआत है, जो शांति समझौते की ओर बढ़ने का रास्ता खोल सकती है.
कनाडा और ऑस्ट्रेलिया की भूमिका
कनाडा और ऑस्ट्रेलिया, जो परंपरागत रूप से इज़रायल के समर्थक माने जाते रहे हैं, उन्होंने भी फिलिस्तीन को मान्यता देने का फैसला कर वैश्विक संतुलन में बदलाव का संकेत दिया है. कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने कहा, "फिलिस्तीन को मान्यता देना सही समय पर सही कदम है जो न्याय और शांति को मजबूती देगा."
ऑस्ट्रेलिया की विदेश मंत्री ने भी कहा कि यह फैसला गाजा में मानवीय संकट और इज़रायली कब्जे की निरंतरता के मद्देनज़र लिया गया है.
क्या होगा इस फैसले का असर?
1. इज़रायल की प्रतिक्रिया
इज़रायल सरकार ने इस फैसले की कड़ी आलोचना की है. प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा है कि यह कदम “आतंकवाद को इनाम” देने जैसा है. उन्होंने स्पष्ट किया कि हमास जैसे संगठनों को बढ़ावा मिलने की आशंका इस मान्यता के साथ बढ़ेगी, और इससे इज़रायल की सुरक्षा को खतरा हो सकता है.
2. अमेरिकी प्रतिक्रिया
अमेरिका की तरफ से अभी तक कोई आधिकारिक समर्थन नहीं मिला है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने हाल ही में ब्रिटेन यात्रा के दौरान कहा था कि वे फिलिस्तीन को मान्यता देने के पक्ष में नहीं हैं. उन्होंने ब्रिटिश सरकार के फैसले को ग़लत समय पर लिया गया राजनीतिक कदम बताया.
3. अंतरराष्ट्रीय स्थिति
अब तक 140 से अधिक देश फिलिस्तीन को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता दे चुके हैं. इसमें भारत, चीन, रूस और ब्राज़ील जैसे प्रमुख विकासशील राष्ट्र पहले से शामिल हैं. लेकिन ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे पश्चिमी लोकतंत्रों का यह पहला बड़ा समर्थन है, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक स्पष्ट संदेश देता है.
‘टू स्टेट सॉल्यूशन’ की वापसी की कोशिश
‘टू स्टेट सॉल्यूशन’, यानी इज़रायल और फिलिस्तीन को अलग-अलग स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता देना, कई दशकों से इस क्षेत्र में स्थायी समाधान के रूप में प्रस्तुत किया गया है. लेकिन यह प्रस्ताव लगातार हमास के चरमपंथ और इज़रायल की सैन्य कार्रवाई के बीच दबता रहा है.
ब्रिटेन का कहना है कि इस मान्यता का उद्देश्य:
इतिहास की नजर में ब्रिटेन की भूमिका
यह कदम इसलिए भी ऐतिहासिक है क्योंकि 1917 में ब्रिटेन ने ही बाल्फोर घोषणापत्र जारी कर यहूदियों के लिए एक अलग देश बनाने की वकालत की थी. इसके बाद ब्रिटेन को फिलिस्तीन पर प्रशासनिक अधिकार मिला था. लेकिन उस दौर में फिलिस्तीनियों के अधिकारों की रक्षा नहीं हो सकी, जिसकी आलोचना आज भी होती है.
अब, जब ब्रिटेन ने खुद आगे आकर फिलिस्तीन को मान्यता दी है, तो इसे इतिहास में संतुलन लाने वाला कदम माना जा रहा है.
गाजा में मानवीय संकट गहराता जा रहा है
इज़रायल और हमास के बीच जारी संघर्ष में:
यूनिसेफ, रेड क्रॉस और UN की रिपोर्ट बार-बार चेतावनी दे रही हैं कि गाजा में हालात नियंत्रण से बाहर होते जा रहे हैं.
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