ब्रिटेन के प्रमुख समाचार पत्र द टेलीग्राफ में पूर्व ब्रिटिश नेवी अफसर टॉम शार्प का एक विवादित लेख प्रकाशित हुआ, जिसका शीर्षक था, "India is an enemy, not a friend or a neutral" यानी "भारत दुश्मन है, न दोस्त, न तटस्थ". इस लेख में भारत को लेकर उठाए गए तर्क और आरोप न केवल निहायत ही एकतरफा हैं, बल्कि यह भी दर्शाते हैं कि कुछ पश्चिमी देशों के विशेषज्ञ अभी भी भारत को अपनी पुरानी उपनिवेशी मानसिकता से देखते हैं. यह लेख तब आया है जब भारत ने रूस के सहयोग से अपनी नई स्टील्थ वॉरशिप INS तमाल को अपनी नौसेना में शामिल किया है. द टेलीग्राफ ने इसे 'पुतिन का फाइनेंसर' और 'पश्चिम का दुश्मन' करार दिया, जो पूरी तरह से आधारहीन और गलत है.
भारत की विदेश नीति और पश्चिम की प्रतिक्रिया
ब्रिटेन जैसे देशों में कुछ विशेषज्ञ आज भी यह नहीं समझ पाए हैं कि भारत अब ब्रिटिश साम्राज्य का उपनिवेश नहीं है. स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से भारत की विदेश नीति का आधार हमेशा "इंडिया फर्स्ट" रहा है, और इसी सोच के तहत भारत ने हमेशा अपनी सुरक्षा, आर्थिक और सामरिक हितों को सर्वोपरि रखा है. रूस के साथ भारत का सैन्य संबंध कोई नई बात नहीं है. यह संबंध 1970 और 80 के दशक से चले आ रहे हैं. ऐसे में यह कहना कि भारत आज भी रूस के साथ संबंधों के कारण पश्चिमी देशों से दुश्मनी रखता है, पूरी तरह से अनुचित है.
भारत की सेना ने ब्रह्मोस मिसाइल और S-400 एयर डिफेंस सिस्टम जैसी शक्तिशाली प्रणालियों से अपनी रक्षा क्षमता को मजबूती दी है. यह प्रणालियां पश्चिमी देशों के लिए नई नहीं हैं, बल्कि ये सभी डीलें 2022 से पहले हुईं थीं. क्या यह उम्मीद करना उचित है कि भारत अपनी सुरक्षा को नजरअंदाज करके सिर्फ पश्चिमी देशों की इच्छाओं के अनुसार अपनी रक्षा खरीद पर रोक लगा दे? इसका उत्तर निश्चित रूप से नहीं हो सकता.
पश्चिमी मीडिया और भारत के रूस के साथ संबंध
भारत की विदेश नीति हमेशा संतुलित रही है. चाहे वह QUAD (अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ) के जरिए हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति बनाए रखना हो, G20 की अध्यक्षता कर वैश्विक नेतृत्व देना हो, या फिर SCO जैसे मंचों पर स्वतंत्र रुख अपनाना हो, भारत ने हमेशा यह साबित किया है कि वह किसी एक गुट का हिस्सा नहीं है. ऐसे में द टेलीग्राफ का भारत को 'दुश्मन' कहना न केवल तथ्यात्मक रूप से गलत है, बल्कि यह उस औपनिवेशिक मानसिकता को उजागर करता है, जो अभी भी भारत को अपनी शर्तों पर चलाना चाहती है.
जब द टेलीग्राफ भारत के रूसी तेल आयात को ‘पुतिन के अत्याचारों का वित्तपोषण’ करार देता है, तो यह पूरी तरह से गलत है. भारत ने पहले ही स्पष्ट किया है कि सस्ता रूसी तेल उसकी ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक स्थिति के लिए महत्वपूर्ण है. वैश्विक स्तर पर जब तेल की कीमतें बढ़ रही थीं, भारत ने अपने 140 करोड़ नागरिकों की आवश्यकताओं को प्राथमिकता दी. ऐसे में अगर भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए रूस से तेल खरीदा, तो वह गलत कैसे हो सकता है?
अगर पश्चिमी देशों को भारत का रूस से तेल आयात गलत लगता है, तो क्यों जापान, जो रूस से तेल खरीद रहा है, पर कोई सवाल नहीं उठाया जाता? यह दोहरे मापदंडों का उदाहरण है जो भारत को निशाना बनाने के लिए अपनाए जाते हैं.
भारत की आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ती राह
रक्षा मामलों में भी भारत अब तेजी से आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहा है. रूस से भारत की रक्षा निर्भरता लगातार घट रही है. स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) के आंकड़े बताते हैं कि 2015-2019 में भारत के कुल हथियार आयात में रूस की हिस्सेदारी 55% थी, जो अब घटकर 36% हो गई है. भारत ने फ्रांस समेत कई पश्चिमी देशों के साथ अपने रक्षा संबंध मजबूत किए हैं. इसके साथ ही भारत ने स्वदेशी मिसाइल प्रणालियां, तेजस विमान और INS विक्रांत जैसे प्रोजेक्ट्स पर भी जोर दिया है.
पाकिस्तान और पश्चिमी देशों का दोगला रुख
भारत के लिए एक और बड़ी चुनौती पश्चिमी देशों का पाकिस्तान के प्रति रुख रहा है. भारत ने बार-बार पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकवाद का मुद्दा उठाया है, जैसे 2008 में मुंबई हमले और 2019 में पुलवामा हमले के दौरान. इसके बावजूद, यूके और अमेरिका ने पाकिस्तान को सैन्य और आर्थिक सहायता दी है और कश्मीर जैसे भारत के आंतरिक मामलों पर भी हस्तक्षेप किया है. जब भारत रूस से तेल या हथियार खरीदता है, तो वही पश्चिमी देश इसे भारत का 'पुतिन समर्थक' घोषित कर देते हैं. यह दोगला रुख स्पष्ट करता है कि पश्चिमी देश अपने राजनीतिक हितों के लिए भारत के खिलाफ नैरेटिव तैयार करते हैं.
भारत के लिए यह क्या मायने रखता है?
अंततः, टॉम शार्प और उनके जैसे अन्य लोग चाहे भारत की विदेश नीति को समझें या न समझें, भारत अपने रास्ते पर चलने को तैयार है. द टेलीग्राफ का यह लेख निश्चित रूप से भारत को बदनाम करने की एक सुनियोजित कोशिश हो सकती है, लेकिन इससे भारत की स्थिति पर कोई असर नहीं पड़ता. भारत ने हमेशा यह साबित किया है कि वह किसी के दबाव में आकर नहीं बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हुए अपने कदम उठाएगा. यह लेख एक बड़े प्रश्न को जन्म देता है कि क्या पश्चिमी दुनिया भारत के विकास और स्वतंत्र नीति को सही रूप में समझेगी, या फिर इसी तरह भारत की आत्मनिर्भरता से जलती रहेगी?
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