Mark Carney Explosive Davos Speech: दावोस 2026 में जो नजारा देखने को मिला, वह दुनिया ने पहले कभी नहीं देखा. वैश्विक मंच पर अब अमेरिका का वर्चस्व वैसा नहीं रहा जैसा पहले था. डोनाल्ड ट्रंप की धमकियों और अनिश्चित नीतियों ने पुराने वर्ल्ड ऑर्डर को हिला दिया है. यूरोपीय देशों ने अब अपने हाथ में सियासी और आर्थिक शक्ति लेनी शुरू कर दी है.
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने ट्रंप को ‘ट्रेड बजूका’ की चेतावनी दी, वहीं यूरोपियन कमीशन की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने भारत के साथ ऐतिहासिक सहयोग की घोषणा की, जिसे उन्होंने ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ कहा. ऐसे समय में कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्ने का भाषण पूरी दुनिया के लिए संदेश बन गया. उनकी 15 मिनट से अधिक लंबी स्पीच में उन्होंने साफ कर दिया कि अब दुनिया पुराने ढर्रे पर लौटने वाली नहीं है.
नियमों वाली दुनिया की मौत
कार्ने ने कहा कि वह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था, जिसे दशकों तक ‘नियम-आधारित व्यवस्था’ कहा जाता था, अब खत्म हो चुकी है. अब कोई नियम नहीं बचा, सिर्फ शक्तिशाली देशों की मनमानी रह गई है. उन्होंने स्पष्ट किया कि पुराने समय की यादों में खोना किसी भी देश की रणनीति नहीं हो सकती.
कार्ने ने कहा, “यदि आप टेबल पर नहीं बैठेंगे, तो मेनू में परोस दिए जाएंगे.” इसका अर्थ यह है कि अब छोटे और मध्यम देशों के लिए यह वक्त का नया नियम बन गया है कि अगर आप वैश्विक मंच पर अपनी जगह नहीं बनाएंगे, तो बड़े देश आपको अपने हितों के लिए दबाएंगे.
ट्रंप की धमकियों का जवाब
स्पीच का सबसे तीखा हिस्सा तब आया जब कार्ने ने ट्रंप की कनाडा को ‘51वां राज्य’ बनाने की धमकी का जिक्र किया. हाल ही में ट्रंप ने एक तस्वीर पोस्ट की थी जिसमें कनाडा और वेनेजुएला पर अमेरिकी झंडा लहरा रहा था. कार्ने ने यह साफ कर दिया कि “कनाडा किसी की जागीर नहीं है.” उनके शब्दों में साहस और स्पष्टता थी, जिसने पूरे मंच पर तालियों की गड़गड़ाहट पैदा कर दी.
ग्रीनलैंड पर ‘आर या पार’ की जंग
डोनाल्ड ट्रंप ने बार-बार ग्रीनलैंड पर कब्जे की बात कही और दुनिया को असुरक्षित बनाने की कोशिश की, लेकिन कार्ने ने दावोस के मंच से साफ कर दिया कि कनाडा ग्रीनलैंड और डेनमार्क के साथ मजबूत खड़ा है. उन्होंने कहा कि ग्रीनलैंड का भविष्य केवल वहां के लोगों द्वारा तय किया जाएगा और किसी भी बाहरी ताकत को इसमें दखल देने का अधिकार नहीं है.
आर्थिक दादागिरी और नई चेतावनी
कार्ने ने अमेरिकी आर्थिक नीतियों की भी आलोचना की. उनका कहना था कि आज शक्तिशाली देश व्यापार का इस्तेमाल रिश्तों को सुधारने के लिए नहीं कर रहे, बल्कि दूसरे देशों को झुकाने और धमकाने के लिए कर रहे हैं. उन्होंने इसे ‘आर्थिक दादागिरी’ करार दिया और सभी मध्यम ताकत वाले देशों को सतर्क रहने की चेतावनी दी.
पावर शिफ्ट का संदेश
कार्ने की स्पीच ने साफ संदेश दिया कि दुनिया अब पुराने अमेरिका-केन्द्रित मॉडल पर नहीं लौटेगी. यूरोप, कनाडा और अन्य विकसित देश अब अपनी ताकत और नीति के जरिए वैश्विक मंच पर नए नियम बना रहे हैं. यह बदलाव न केवल राजनीतिक और आर्थिक है, बल्कि यह वैश्विक सुरक्षा और रणनीति के नए युग की शुरुआत भी दिखाता है.
इस दावोस सम्मेलन ने यह सिद्ध कर दिया कि अब छोटे और मध्यम देश भी वैश्विक निर्णयों में अपनी भूमिका निभा सकते हैं. और अगर वे एकजुट नहीं हुए, तो बड़े देश उन्हें अपने इशारों पर चलाने की कोशिश करेंगे. मार्क कार्ने की यह स्पीच इसलिए ऐतिहासिक बन गई क्योंकि इसने दुनिया के सामने साफ कर दिया कि अब नियमों की दुनिया नहीं, ताकत और समझदारी की दुनिया चल रही है.
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