जब अमेरिका ने H‑1B वीजा पर 100,000 डॉलर की भारी शुल्क लागू करने की घोषणा की, तो कई देशों ने इसे भारत की प्रतिभाओं को आकर्षित करने का सुनहरा अवसर माना है. इस मोड़ पर कनाडा सबसे सक्रिय दिख रहा है, जिसने स्वीकृति व्यक्त की है कि यह कदम उसके लिए एक महत्वपूर्ण टोलेनेटिक और शोध केंद्र बनने की राह खोल सकता है.
कनाडा के प्रधान मंत्री मार्क कार्नी ने इस बदलाव को सार्वजनिक रूप से स्वीकारा है. लंदन में पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने कहा कि अमेरिका अब उतने H‑1B वीजा नहीं दे पाएगा, जिससे कुशल पेशेवर दूसरी जगहों की ओर रुख कर सकेंगे. उन्होंने यह भी कहा कि कनाडा जल्द ही एक प्रस्ताव लाएगा ताकि इन वीजाधारकों को स्थायी और आकर्षक अवसर मिल सकें. हमारे विश्वविद्यालयों से तैयार होने वाली प्रतिभा अक्सर अमेरिका चली जाती है. अब ऐसे समय में, शायद उनमें कई को ही यहाँ रोक सकें. उनका मानना है कि इस वैश्विक बदलाव का सबसे बड़ा लाभ भारतीय पेशेवरों को होगा, क्योंकि भारत H‑1B वीजा में सबसे अधिक प्रतिशत (लगभग 70%) वीजाधारकों का स्रोत रहा है.
अमेरिका का तर्क और भारतीयों पर असर
ट्रम्प प्रशासन ने इस शुल्क वृद्धि को “अमेरिकियों की नौकरियों की रक्षा” के उद्देश्य से लागू किया है. इस फैसले से अनेक भारतीय कंपनियाँ विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त करने से पहले खर्च‑लागत आंकने को मजबूर होंगी. भारत की टेक्नोलॉजी और आईटी क्षेत्र की जनशक्ति, जो वर्षों से वैश्विक स्तर पर नाम कमा रही है, अब कई देश अपनी ओर मोड़ने की दौड़ में हैं.
यूरोप में वैकल्पिक प्रस्ताव: ब्रिटेन और जर्मनी भी दरवाजा खोल रहे
ब्रिटेन में कीर स्टार्मर नेतृत्व वाली सरकार ने पहले ही कोशिशें शुरू कर दी हैं कि शीर्ष प्रतिभाओं को आकर्षित करने के लिए वीजा शुल्क हटाए जाएँ. उनका मानना है कि ऐसे विशेषज्ञ वैज्ञानिकों, अकादमिकों और डिजिटल माहिरों को ब्रिटेन में लाना एक प्रतिस्पर्धात्मक लाभ पैदा करेगा.जर्मनी ने भी कदम बढ़ाया है. भारत में तैनात जर्मन राजदूत डॉ. फिलिप एकरमैन ने कुशल भारतीयों को खुला निमंत्रण दिया है. उनका कहना है कि “एक भारतीय पेशेवर जो जर्मनी में काम करता है, वह औसत जर्मन से ज़्यादा कमा सकता है. उन्हें मेहनत और श्रेष्ठता की नीति से सम्मान मिलता है.”
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