Chhath Puja 2025: लोक आस्था का महापर्व छठ पूजा आज से शुरू हो गया है. गंगा, तालाब और नदियों के किनारे श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ने लगी है. हर ओर आस्था का सागर दिखाई दे रहा है, कहीं व्रती स्नान कर प्रसाद की तैयारी में जुटे हैं, तो कहीं घाटों को सजाया जा रहा है. यह चार दिवसीय पर्व नहाय-खाय से शुरू होकर उदयमान सूर्य को अर्घ्य देने के साथ पूर्ण होता है.
छठ पूजा न केवल शुद्धता और संयम का पर्व है, बल्कि यह प्रकृति, परिवार और संस्कृति के प्रति कृतज्ञता का उत्सव भी है. सूर्य देव और छठी मैया की आराधना से जुड़ा यह पर्व बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश के अलावा देश-विदेश में बसे लाखों भारतीयों के लिए भावनाओं से भरा अवसर होता है.
बांस का सुपा: प्रकृति और परंपरा का प्रतीक
छठ पूजा में बांस का सुपा (सूप) सबसे पारंपरिक और पवित्र माना जाता है. प्राचीन काल से ही व्रती महिलाएं बांस के सुपे में ठेकुआ, फल और प्रसाद सजाकर सूर्य देव को अर्घ्य देती आई हैं.
बांस को विकास और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है. मान्यता है कि जैसे बांस कुछ ही सप्ताह में ऊँचाई पर पहुँच जाता है, वैसे ही इस सुपे में की गई पूजा संतान की प्रगति और परिवार की उन्नति लाती है. बांस की यह वस्तु पूरी तरह प्राकृतिक और सात्विक होती है, जो छठ के शुद्धता सिद्धांत को सबसे अच्छी तरह दर्शाती है.
पीतल का सुपा: वैभव और आधुनिकता का संगम
आधुनिक समय में कई लोग छठ पूजा में पीतल के सुपा और कलश का उपयोग भी करने लगे हैं. शास्त्रों में पीतल (पित्तल) को सूर्य भगवान का प्रतीक बताया गया है, क्योंकि इसका रंग सूर्य की तरह सुनहरा होता है.
ऐसा माना जाता है कि पीतल का सुपा समृद्धि, वैभव और ऊर्जा का प्रतीक है. इसलिए जो व्रती आधुनिकता के साथ परंपरा को जोड़ना चाहते हैं, उनके लिए पीतल का सुपा भी उतना ही शुभ माना जाता है.
तो कौन-सा सुपा है सबसे शुभ?
दोनों सुपे- बांस और पीतल का अपना अलग महत्व है.
अगर आप छठ को उसकी मूल परंपरा के अनुसार मनाना चाहते हैं, तो बांस का सुपा सबसे शुभ रहेगा. वहीं अगर आप पूजा में आधुनिकता का स्पर्श जोड़ना चाहते हैं, तो पीतल का सुपा भी श्रेष्ठ विकल्प है.
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