Cough Syrup Deaths: दवा या जहर ? Aditi Nagar से सुनिए सच्चाई | Political Corridor

एक साधारण खांसी का इलाज, जो मां-बाप के विश्वास पर सवार होकर घरों में घुसा, लेकिन उसके पीछे छिपा था मौत का काला साया. मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा और बैतूल से राजस्थान के सीकर व भरतपुर तक, 23 मासूमों की आंखों की चमक हमेशा के लिए बुझ गई.

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नई दिल्ली: एक साधारण खांसी का इलाज, जो मां-बाप के विश्वास पर सवार होकर घरों में घुसा, लेकिन उसके पीछे छिपा था मौत का काला साया. मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा और बैतूल से राजस्थान के सीकर व भरतपुर तक, 23 मासूमों की आंखों की चमक हमेशा के लिए बुझ गई. यह कोई प्राकृतिक विपत्ति नहीं, बल्कि मानवीय लापरवाही का काला अध्याय है, जहरीली कफ सिरप की कहानी, जो डॉक्टर की सलाह पर, फार्मासिस्ट की मुहर पर और सरकारी अस्पतालों की गोद में बंटी. 2025 में भी, जब हम वैज्ञानिक प्रगति का दावा कर रहे हैं, यह घटना पूरे सिस्टम की पोल खोलती है. आइए, इस दर्दनाक सच्चाई को समझें, जहां हर बूंद जहर की तरह घुली हुई थी.

मासूमों पर टूटा कहर

यह त्रासदी रातोंरात नहीं घटी. छिंदवाड़ा में 17 बच्चे, बैतूल में 2, और राजस्थान के सीकर-भरतपुर में 3-4 मासूमों की जानें गईं. कुल 23 मौतें, जिनमें ज्यादातर 5 साल से कम उम्र के बच्चे थे. शुरुआत हुई एक साधारण खांसी-जुकाम से. डॉक्टर ने प्रिस्क्रिप्शन लिखा – कोल्ड्रिफ या केसंस फार्मा का डेक्सट्रोमेथॉर्फन सिरप. मां-बाप ने भरोसे से पिलाया, लेकिन अगले ही दिनों बच्चों को किडनी फेलियर, उल्टी, बुखार और अंततः मौत ने घेर लिया. मध्य प्रदेश में 20 मौतें, राजस्थान में 2-3, और जांच अभी जारी है. यह सिर्फ आंकड़े नहीं, टूटे परिवारों की चीखें हैं. 

कोल्ड्रिफ और केसंस का काला सच

इस मौत का एक नहीं, दो नाम थे. पहला, श्रीसन फार्मास्यूटिकल्स का कोल्ड्रिफ सिरप, जो तमिलनाडु के कांचीपुरम में बना. लैब रिपोर्ट्स ने खुलासा किया – इसमें 48.6% डाईथिलीन ग्लाइकॉल (DEG) था, जबकि सुरक्षित सीमा सिर्फ 0.1% है. यह DEG कोई साधारण केमिकल नहीं; यह ब्रेक फ्लूइड, पेंट और फ्रीजर लिक्विड में इस्तेमाल होता है – एक औद्योगिक जहर जो किडनी को चुपके से तबाह कर देता है. दूसरा, राजस्थान की जयपुर-बेस्ड केसंस फार्मा का डेक्सट्रोमेथॉर्फन सिरप, जो सरकारी फ्री मेडिसिन स्कीम के तहत बंटा. इस कंपनी पर पहले से 42 सैंपल फेल होने के आरोप थे, 2023 में मेंथॉल की कम मात्रा और 2025 में ड्रग सेफ्टी उल्लंघनों के कारण. फिर भी, यह सिरप बाजार में घूमता रहा. 

लापरवाह चेहरे: डॉक्टर से लेकर कंपनी मालिक तक

डॉक्टर की कलम ने विश्वास जगाया, लेकिन प्रवीण सोनी जैसे सरकारी पीडियाट्रिशियन को गिरफ्तार किया गया, क्योंकि उन्होंने सैकड़ों बच्चों को यह सिरप प्रिस्क्राइब किया. फार्मासिस्ट ने बिना सवाल बेचा. लेकिन असली दोषी? श्रीसन के मालिक जी. रंगनाथन गोविंदन, जिन्हें चेन्नई से मध्य प्रदेश पुलिस ने गिरफ्तार किया. उनकी फैक्ट्री में 350 उल्लंघन – 39 क्रिटिकल, 325 मेजर. गंदगी, जंग लगी मशीनें, बिना ट्रेंड स्टाफ, और गैर-फार्मा ग्रेड केमिकल्स. कंपनी 1990 में शुरू हुई, लेकिन 2009 में स्ट्रक ऑफ हो गई – फिर भी बिना लाइसेंस दवाएं बनाती रही. केसंस फार्मा के मालिक वीरेंद्र कुमार गुप्ता पर भी सवाल, लेकिन अभी तक पूछताछ नहीं. ये चेहरे सिस्टम की कमजोरी के प्रतीक हैं. 

दोषपूर्ण सिस्टम: बैन, गिरफ्तारियां, लेकिन क्या बदलाव?

मौतों के बाद ताबड़तोड़ एक्शन: मध्य प्रदेश में एसआईटी बनी, ड्रग कंट्रोलर हटाए गए, दो डिप्टी और इंस्पेक्टर सस्पेंड. कोल्ड्रिफ सहित कई सिरप बैन – महाराष्ट्र, यूपी, पंजाब, केरल में भी. राजस्थान ने केसंस की 19 दवाओं पर रोक लगाई, ड्रग कंट्रोलर सस्पेंड. पैरेंट्स को एडवाइजरी – 2-5 साल के बच्चों को कफ सिरप न दें. लेकिन केंद्र का 18 दिसंबर 2023 का आदेश, जो 4 साल से कम उम्र वालों के लिए क्लोरफेनिरामाइन-फेनिरामाइन युक्त सिरप पर चेतावनी लेबल अनिवार्य करता था, लागू ही नहीं हुआ. न दवा कंपनियों ने लेबल बदले, न राज्यों ने जागरूकता फैलाई. सीडीएससीओ और ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया की नींद कब टूटेगी? 

2022 से चली आ रही मिलावट की जंजीर

यह पहली बार नहीं. 2022 में गांबिया में मेड इन इंडिया सिरप से 70 मौतें, 2023 में उज्बेकिस्तान (18 मौतें) और कैमरून में सवाल. भारत में भी 2019-20 में जम्मू-कश्मीर में 12 मौतें. हर बार वही DEG-EG का जहर, हर बार वादे, लेकिन 2025 में फिर वही कहर. श्रीसन जैसी कंपनियां क्वालिटी चेक के 40 पैमानों पर फेल, फिर भी बाजार में. WHO ने चेतावनी दी – भारत की दवाएं विदेशों तक खतरा बन रही हैं. यह सिस्टम की ICU वाली हालत को दर्शाता है, जहां भ्रष्टाचार का इलाज नहीं.