अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने पाकिस्तान की मौजूदा आर्थिक और प्रशासनिक स्थिति पर एक विस्तृत और कड़े लहजे वाली रिपोर्ट जारी करते हुए कहा है कि देश में भ्रष्टाचार अब सिर्फ प्रशासनिक समस्या नहीं रहा, बल्कि शासन-प्रणाली, राजनीति और अर्थव्यवस्था के ढांचे में गहराई तक जड़ जमाए हुए है.
186 पन्नों की इस विस्तृत रिपोर्ट ने पाकिस्तान के शीर्ष नेतृत्व- प्रधानमंत्री कार्यालय और सेना की उच्च कमान तक भ्रष्टाचार की पहुंच का उल्लेख करते हुए देश के भविष्य को लेकर गंभीर चिंता जताई है.
रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पिछले दो दशकों में लगातार खराब हुई है और इसके पीछे प्रमुख कारण है- नीतिगत भ्रष्टाचार, रेंट-सीकिंग, प्रभावशाली समूहों का आर्थिक फैसलों पर नियंत्रण और प्रशासनिक तंत्र की कमजोरी.
भ्रष्टाचार सबसे बड़ा आर्थिक खतरा
IMF ने कहा कि भ्रष्टाचार ने पाकिस्तान की सरकारी व्यवस्था को अंदर से खोखला कर दिया है.
रिपोर्ट के अनुसार:
संस्था का कहना है कि भ्रष्टाचार को नियंत्रित करने के मामले में पाकिस्तान दुनिया के सबसे कमजोर देशों की सूची में लगातार बना हुआ है. आंकड़े बताते हैं कि सुधार के प्रयासों के बावजूद पिछले 20 वर्षों में स्थिति बद से बदतर हुई है.
एलिट कैप्चर: चुनिंदा समूहों के हाथ में देश
IMF की रिपोर्ट ने सबसे खतरनाक रूप से “एलीट कैप्चर” को पाकिस्तान की आर्थिक समस्याओं की जड़ बताया है. इस शब्द का अर्थ है कि राजनीतिक ताकत, सैन्य प्रभाव और आर्थिक संसाधन कुछ सीमित समूहों के हाथों में केंद्रित हों, जिससे राष्ट्रीय योजनाओं और सरकारी संसाधनों पर उन्हीं का नियंत्रण हो जाए.
IMF का कहना है कि कई निर्णय ऐसे समूह लेते हैं जो स्वयं सरकारी संस्थाओं या शक्तिशाली प्रतिष्ठानों से जुड़े होते हैं, और यही प्रणाली देश के विकास को लगातार रोक रही है.
5.3 ट्रिलियन रुपये की वसूली
रिपोर्ट में यह आंकड़ा दिया गया है कि जनवरी 2023 से दिसंबर 2024 के बीच पाकिस्तान में भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों में 5.3 ट्रिलियन रुपये की राशि वसूल की गई. लेकिन IMF का दावा है कि यह धनराशि असल नुकसान का छोटा हिस्सा भर है, क्योंकि सरकार के पास यह रिकॉर्ड ही नहीं है कि वर्षों में भ्रष्टाचार के कारण कितना पैसा बर्बाद हुआ.
विशेषज्ञों का कहना है कि इतने बड़े पैमाने पर नुकसान होना दिखाता है कि भ्रष्टाचार न केवल व्यापक है बल्कि प्रणालीगत स्तर पर मौजूद है.
न्याय प्रणाली पर प्रहार: अदालतों पर भरोसा घटा
IMF रिपोर्ट का एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान की न्यायिक व्यवस्था की कमजोरियों पर केंद्रित है. इसमें कहा गया है कि अदालतें:
इसी वजह से न तो उद्योगों को सुरक्षा मिल पाती है और न ही आम लोगों को न्याय.
पाकिस्तान के सर्वेक्षणों का हवाला देते हुए रिपोर्ट कहती है कि देश की जनता अदालतों और पुलिस को सबसे अधिक भ्रष्ट संस्थान मानती है और 68% लोग भ्रष्टाचार विरोधी एजेंसियों को राजनीतिक हथियार के रूप में देखते हैं.
सरकारी विभागों पर गंभीर सवाल
IMF ने टैक्स संग्रह, सरकारी खरीद, कस्टम विभाग, सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों (SOEs) और पूंजीगत खर्च में गहरी कमजोरियों को चिन्हित किया है. रिपोर्ट बताती है कि कई आर्थिक फैसले पारदर्शिता से दूर लिए जाते हैं और कई बार संसद को शामिल किए बिना ही अतिरिक्त बजट जारी कर दिया जाता है.
सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के बारे में बताया गया है कि उनका आकार इतना बड़ा है कि उनकी संपत्तियों का मूल्य देश की कुल अर्थव्यवस्था के करीब आधे (48%) के बराबर हो गया है, जिससे भ्रष्टाचार की आशंका और बढ़ जाती है और निजी निवेशकों का भरोसा टूटता है.
SIFC: शक्तिशाली संस्था, लेकिन पारदर्शिता कमजोर
रिपोर्ट में पहली बार स्पेशल इन्वेस्टमेंट फैसिलिटेशन काउंसिल (SIFC) को लेकर भी स्पष्ट चिंता जताई गई है. यह संस्था विदेशी निवेश से जुड़े बड़े फैसले लेती है, लेकिन इसकी प्रक्रियाएँ सार्वजनिक नहीं की जातीं.
IMF ने कहा है कि:
संस्था से पहली बार यह मांग की गई है कि वह अपनी पूरी वार्षिक रिपोर्ट सार्वजनिक करे, जिसमें टैक्स छूट, दी गई रियायतें, और अनुमोदित परियोजनाओं की सूची शामिल हो.
चेतावनी: सुधार नहीं हुए तो संकट गहराएगा
IMF का कहना है कि अगर पाकिस्तान पारदर्शिता बढ़ाता है—
तो अगले पांच सालों में उसकी आर्थिक वृद्धि 5% से 6.5% तक पहुंच सकती है.
लेकिन यदि पाकिस्तान सुधारों को लागू नहीं करता, तो वह:
रिपोर्ट के अंतिम शब्द पाकिस्तान की स्थिति को बेहद स्पष्ट रूप से बयान करते हैं- “देश आर्थिक रूप से कमजोर, राजनीतिक रूप से अस्थिर और बाहरी कर्ज पर निर्भर राष्ट्र बन चुका है.”
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