क्या चीन-अमेरिका की लड़ाई की भेंट चढ़ा नेपाल, पड़ोस में तख्तापलट से भारत को कितना खतरा? जानें सबकुछ

नेपाल, जिसे कभी शांत हिमालयी राष्ट्र कहा जाता था, आज राजनीतिक और सामाजिक उथल-पुथल की चपेट में है.

Did Nepal become a victim of the China-US war
प्रतिकात्मक तस्वीर/ ANI

नेपाल, जिसे कभी शांत हिमालयी राष्ट्र कहा जाता था, आज राजनीतिक और सामाजिक उथल-पुथल की चपेट में है. काठमांडू की सड़कों पर युवा लाठियों और नारों के साथ उतर आए हैं, संसद भवन धुएं में लिपटा है, और प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है.

ये सवाल अब हर तरफ उठ रहे हैं कि क्या ये सब केवल सोशल मीडिया पर प्रतिबंध के कारण हुआ? या इसके पीछे कोई और बड़ी शक्ति है? क्या नेपाल अमेरिका और चीन की छद्म जंग का नया मैदान बन गया है?

कैसे शुरू हुआ नेपाल में विरोध?

नेपाल में शुरू हुए इस नए आंदोलन का जन्म हुआ था एक प्रतीकात्मक घटना- सोशल मीडिया पर सरकारी प्रतिबंध. लेकिन जैसे-जैसे सड़कों पर भीड़ बढ़ी, नारों में गूंजने लगा असली दर्द भ्रष्टाचार, असमानता, और सत्ता में बैठे नेताओं की मनमानी.

प्रदर्शनकारियों का कहना है कि देश की राजनीति पर कुछ गिने-चुने परिवारों का कब्जा है. आम जनता हाशिए पर है, नौकरियां खत्म हो रही हैं, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं चरमरा रही हैं.

सरकार ने जैसे ही सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाया, यह आग और भड़क उठी. सरकार ने प्रतिबंध तो वापस ले लिया, लेकिन तब तक यह आंदोलन एक जनक्रांति में तब्दील हो चुका था.

क्या नेपाल में लोकतंत्र डगमगा गया?

केपी शर्मा ओली, जो चीन समर्थक माने जाते हैं, को चौथी बार प्रधानमंत्री बनने के बावजूद अपना कार्यकाल पूरा करने का अवसर नहीं मिला. इस बार उन्हें जनता के गुस्से ने सत्ता से बाहर कर दिया.

सिर्फ इस्तीफा ही नहीं, देश में राजनेताओं के घरों को जलाया जा रहा है, सुप्रीम कोर्ट और संसद जैसे संस्थानों को भीड़ के गुस्से से नहीं बख्शा गया. यह केवल राजनीतिक संकट नहीं है, बल्कि नेपाल के लोकतांत्रिक ढांचे की परीक्षा है.

जो कुछ अभी नेपाल में हो रहा है, वह साफ संकेत देता है कि जनता अब समझौतों के लिए तैयार नहीं है. देश के युवाओं को अब किसी नारे से बहलाया नहीं जा सकता, वे बदलाव के लिए हर हद तक जाने को तैयार हैं.

क्या नेपाल बना सियासी लड़ाई का शिकार?

नेपाल की मौजूदा उथल-पुथल को सिर्फ घरेलू मुद्दों से जोड़कर देखना शायद तस्वीर को अधूरा दिखाना होगा. पिछले कुछ वर्षों में नेपाल में चीन और अमेरिका दोनों की दिलचस्पी असामान्य रूप से बढ़ी है.

नेपाल के नेता चीन के साथ सैन्य और आर्थिक समझौते करते रहे हैं, वहीं अमेरिका ने नेपाल में लोकतांत्रिक ढांचे को मज़बूत करने के नाम पर अपनी मौजूदगी बढ़ाई है.

ओली जैसे नेता खुले तौर पर चीन के पक्षधर माने जाते हैं. वे हाल ही में चीनी मिलिट्री परेड और एससीओ समिट में भी शामिल हुए थे. ऐसे में यह सवाल उठना लाज़िमी है कि क्या अमेरिका ने नेपाल की सत्ता संतुलन को अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश की?

क्या बांग्लादेश और श्रीलंका का स्क्रिप्ट?

नेपाल में चल रहा मौजूदा जन आंदोलन पूरी तरह से नया नहीं है. कुछ इसी तरह के दृश्य हमने 2022 में श्रीलंका और 2024 में बांग्लादेश में भी देखे थे.

इन दोनों देशों में भी जनता का गुस्सा घरेलू मुद्दों से शुरू हुआ, लेकिन जल्द ही ये आंदोलन सत्ता पलट तक पहुंच गए. युवाओं ने मोर्चा संभाला, नेताओं के घरों में आग लगी, और सत्ता के सिंहासन हिल गए.

क्या नेपाल अब इसी ट्रेंड का अगला पड़ाव बन गया है? क्या इसे "दक्षिण एशिया का नया संकट केंद्र" कहा जा सकता है?

भारत के लिए खतरे की घंटी?

नेपाल में जो कुछ भी हो रहा है, वह सिर्फ वहां की राजनीति का मामला नहीं है. यह भारत के लिए भी एक कूटनीतिक और रणनीतिक चेतावनी है. नेपाल भारत का घनिष्ठ पड़ोसी ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक रूप से जुड़ा हुआ राष्ट्र है.

अगर नेपाल की राजनीतिक स्थिरता लगातार कमजोर होती रही, और वहां बाहरी शक्तियों की दखलअंदाजी बढ़ती रही, तो सीधे तौर पर भारत की सीमाओं की सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता पर असर पड़ेगा.

भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि नेपाल की स्वायत्तता बनी रहे, और वह बाहरी ताकतों की सियासी जंग का मैदान न बने.

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