अमेरिका में काम करने का सपना देख रहे विदेशी प्रोफेशनल्स के लिए एक नई चुनौती खड़ी हो गई है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में H-1B वीज़ा कार्यक्रम में बड़े बदलाव किए गए हैं. इन बदलावों का असर खासकर भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स और उन कंपनियों पर पड़ेगा जो इस वीज़ा के ज़रिए अमेरिकी बाज़ार में प्रतिभाशाली कर्मचारियों को नियुक्त करती हैं.
अब H-1B वीज़ा के लिए आवेदन करने वाली कंपनियों को $100,000 (लगभग ₹88 लाख) की भारी-भरकम फीस चुकानी होगी. पहले जहां कुछ सौ डॉलर से आवेदन की प्रक्रिया शुरू होती थी, अब इतनी ऊंची फीस के कारण यह वीज़ा छोटी कंपनियों और स्टार्टअप्स के लिए लगभग असंभव हो जाएगा.
नए नियमों के तहत क्या बदला?
व्हाइट हाउस के स्टाफ सेक्रेटरी विल शार्फ ने कहा कि H-1B वीज़ा का उद्देश्य केवल ऐसे उच्च कुशल विदेशी कर्मचारियों को लाना है जिनकी विशेषज्ञता अमेरिका में नहीं मिलती. उनका मानना है कि अब तक इस वीज़ा का "काफी दुरुपयोग" हुआ है.
अमेरिका की नीति में सख्ती क्यों?
अमेरिकी वाणिज्य सचिव हॉवर्ड लूटनिक के अनुसार, अब बड़ी कंपनियों को भी विदेशी कर्मचारियों को ट्रेन करने से पहले सोचना पड़ेगा. उन्हें पहले वीज़ा फीस चुकानी होगी, फिर वेतन भी देना होगा – जो उन्हें अर्थिक रूप से व्यावहारिक नहीं लगता. उनका कहना है कि कंपनियों को चाहिए कि वे अमेरिकी ग्रेजुएट्स को ट्रेन करें और रोजगार के अवसर पहले अपने देश के युवाओं को दें.
टेक कंपनियों पर क्या असर होगा?
अमेज़न ने 2025 की पहली छमाही में 10,000 से ज़्यादा H-1B वीज़ा हासिल किए. माइक्रोसॉफ्ट और मेटा जैसी कंपनियों को 5,000 से अधिक वीज़ा अप्रूवल मिले हैं. बड़ी कंपनियां भारी खर्च उठाने में सक्षम हैं, लेकिन छोटी टेक फर्म्स और स्टार्टअप्स के लिए यह नई नीति भारी आर्थिक दबाव बन सकती है.
भारतीयों पर सीधा असर
H-1B वीज़ा धारकों में भारत की हिस्सेदारी 71% है. यह वीज़ा खासतौर पर आईटी, इंजीनियरिंग, एजुकेशन और हेल्थकेयर जैसे क्षेत्रों में इस्तेमाल होता है. चीन दूसरे नंबर पर है लेकिन उसकी हिस्सेदारी महज़ 11.7% है. स्पष्ट है कि नई नीति का सबसे बड़ा प्रभाव भारतीय पेशेवरों पर पड़ेगा, जो अमेरिका में करियर बनाना चाहते हैं.
क्यों अहम है H-1B प्रोग्राम?
H-1B वीज़ा कार्यक्रम के तहत हर साल लगभग 65,000 वीज़ा जारी होते हैं, जबकि एडवांस डिग्री धारकों के लिए 20,000 अतिरिक्त वीज़ा दिए जाते हैं. यह वीज़ा तीन साल के लिए मान्य होता है और बाद में इसे छह साल तक बढ़ाया जा सकता है. अब तक कंपनियों को एक नाममात्र शुल्क देकर लॉटरी सिस्टम के ज़रिए वीज़ा मिल जाता था, लेकिन अब बदलते नियमों के चलते यह प्रक्रिया केवल उन्हीं के लिए संभव होगी जो वास्तव में उच्च कुशल हैं और जिनके बिना अमेरिकी उद्योग में रिक्तियां नहीं भरी जा सकतीं.
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