IIT बॉम्बे में फाइनल ईयर के स्टूडेंट ने हॉस्टल की छत से लगाई छलांग, एक साल में 7 IIT में 14 सुसाइड

देश के प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थान आईआईटी बॉम्बे से एक बार फिर दिल दहलाने वाली खबर आई है.

Final year student of IIT Bombay commits suicide
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मुंबई: देश के प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थान आईआईटी बॉम्बे से एक बार फिर दिल दहलाने वाली खबर आई है. 22 वर्षीय रोहित सिन्हा, जो मेटा साइंस विभाग में फाइनल ईयर का छात्र था, ने पवई स्थित अपने हॉस्टल की 10वीं मंजिल से छलांग लगाकर आत्महत्या कर ली. यह घटना शनिवार देर रात करीब 2:30 बजे की बताई जा रही है.

दिल्ली निवासी रोहित की मौत ने एक बार फिर से आईआईटी और अन्य शीर्ष शैक्षणिक संस्थानों में छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़े कर दिए हैं. पुलिस के अनुसार, मौके पर कोई सुसाइड नोट नहीं मिला है. फिलहाल रोहित का मोबाइल और उसके सोशल मीडिया अकाउंट्स खंगाले जा रहे हैं ताकि आत्महत्या के पीछे की वजह को समझा जा सके.

घटनाक्रम और शुरुआती जांच

घटना के समय हॉस्टल की छत पर एक अन्य छात्र मोबाइल फोन पर बात कर रहा था. उसी छात्र ने सबसे पहले रोहित को गिरते हुए देखा और तत्काल अन्य छात्रों की मदद से उसे नजदीकी हीरानंदानी अस्पताल पहुंचाया गया. लेकिन डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया.

पुलिस ने बताया कि शव को पोस्टमॉर्टम के लिए भेजा गया है और आकस्मिक मृत्यु का मामला दर्ज कर लिया गया है. रोहित के परिवार और उसके करीबी दोस्तों से भी पूछताछ की जा रही है ताकि किसी प्रकार की व्यक्तिगत या शैक्षणिक परेशानी का पता लगाया जा सके.

आईआईटी में आत्महत्याओं का बढ़ता ग्राफ

यह अकेला मामला नहीं है. जनवरी 2024 से अब तक देशभर के आईआईटी में कुल 14 छात्रों ने आत्महत्या की है. इनमें सबसे ज्यादा 4 मामले आईआईटी खड़गपुर से सामने आए हैं. यह आंकड़ा बेहद चिंताजनक है और यह दर्शाता है कि देश के ये शैक्षणिक संस्थान केवल ज्ञान के केंद्र नहीं बल्कि मानसिक दबाव और संस्थागत चुनौतियों का भी अड्डा बनते जा रहे हैं.

RTI के तहत मिले आंकड़ों के मुताबिक, साल 2005 से 2024 के बीच आईआईटी संस्थानों में 115 आत्महत्याएं दर्ज की गई हैं. विशेष रूप से 2019 से 2024 के बीच 37 मामलों ने इस संकट की गहराई को उजागर किया है.

सुधार की कोशिशें, लेकिन क्या काफी हैं?

बढ़ते मामलों के मद्देनज़र 2024 में आईआईटी प्रशासन ने कुछ महत्वपूर्ण नीतिगत बदलाव किए. इनमें अटेंडेंस नियमों में ढील, लंबे अवकाश और मानसिक स्वास्थ्य को लेकर वर्कशॉप्स और हेल्पलाइन शुरू करने जैसे प्रयास शामिल हैं.

इसके अतिरिक्त, एक 10 सदस्यीय समिति भी गठित की गई जो आत्महत्या की घटनाओं को रोकने और छात्रों की मानसिक स्थिति को बेहतर बनाने के उपाय सुझा रही है. हालांकि, इन प्रयासों के बावजूद आत्महत्या की घटनाएं नहीं रुक रही हैं.

सुप्रीम कोर्ट की सख्ती और दिशा-निर्देश

25 जुलाई 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने इस संवेदनशील मुद्दे पर गहरी चिंता जताई और इसे "सिस्टम की नाकामी" करार दिया. जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ऐसे मामलों को नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि वर्ष 2022 में भारत में 1,70,924 लोगों ने आत्महत्या की, जिनमें 13,044 छात्र थे.

यह आंकड़े बेहद चौंकाने वाले हैं. खासकर तब, जब इनमें से 2,248 छात्र केवल परीक्षा में फेल होने की वजह से अपनी जान गंवा बैठे. रिपोर्ट यह भी बताती है कि हर 100 आत्महत्याओं में करीब 8 आत्महत्याएं छात्रों की होती हैं.

कोर्ट ने इस स्थिति से निपटने के लिए 15 महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए हैं. इन दिशा-निर्देशों में मानसिक स्वास्थ्य काउंसलिंग को अनिवार्य बनाना, छात्रों के लिए प्रशिक्षित मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की नियुक्ति, फीडबैक आधारित टीचिंग सिस्टम और फेल्योर के प्रति संस्थानों की दृष्टिकोण में बदलाव जैसी बातें शामिल हैं.

केंद्र सरकार पर जवाबदेही

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को 90 दिनों के भीतर एक हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है, जिसमें बताया जाए कि नेशनल टास्क फोर्स द्वारा दी गई सिफारिशों पर कब तक अमल होगा. टास्क फोर्स का काम छात्रों की मानसिक स्थिति को समझना और आत्महत्या जैसी घटनाओं को रोकने के लिए प्रभावशाली नीतियां तैयार करना है.

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