पेरिस: फ्रांस की राजनीति में एक और बड़ा मोड़ तब आया, जब प्रधानमंत्री सेबास्टियन लेकोर्नु ने पदभार संभालने के महज 27 दिन बाद ही अपना इस्तीफा दे दिया. यह फैसला सोमवार को उनके मंत्रिमंडल की घोषणा के कुछ ही घंटों बाद सामने आया, जिसने राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की सरकार को फिर से अस्थिर कर दिया है.
लेकोर्नु के इस्तीफे के साथ, एक साल के भीतर फ्रांस के चौथे प्रधानमंत्री ने पद छोड़ा है, और मैक्रों के सामने अब पांचवें प्रधानमंत्री की तलाश की कठिन चुनौती है. यह घटनाक्रम फ्रांस में जारी राजनीतिक अस्थिरता को और गहरा करता है, जहाँ बीते एक साल से कोई भी सरकार स्थायी नहीं टिक पा रही है.
सिर्फ 27 दिन का कार्यकाल बना रिकॉर्ड
सेबास्टियन लेकोर्नु फ्रांस के इतिहास में सबसे कम समय तक प्रधानमंत्री रहने वालों में शामिल हो गए हैं. उन्होंने 26 दिनों तक बिना किसी सक्रिय कार्यशील मंत्रिमंडल के प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए एक और रिकॉर्ड बनाया.
सिर्फ 12 घंटे पहले ही उन्होंने अपने मंत्रिमंडल की घोषणा की थी, लेकिन उसके तुरंत बाद अलग-अलग राजनीतिक दलों, मीडिया और जनता की ओर से तीखी आलोचना शुरू हो गई. आलोचना का मुख्य कारण यह था कि उन्होंने पुराने चेहरों को ही दोहराया, जिससे सरकार में कोई खास बदलाव नजर नहीं आया.
फ्रांस में राजनीतिक संकट की पृष्ठभूमि
फ्रांस बीते एक साल से गंभीर राजनीतिक गतिरोध से गुजर रहा है. राष्ट्रपति मैक्रों ने 2022 के संसदीय चुनावों में पूर्ण बहुमत खो दिया, और इसके बाद से हर प्रधानमंत्री को अल्पमत सरकार चलाने की चुनौती का सामना करना पड़ा है.
लेकिन उनका कार्यकाल भी विवादों में घिर गया, और वे मंत्रिमंडल गठन के बाद राजनीतिक समर्थन जुटाने में विफल रहे.
नेशनल असेंबली भंग करने की मांग
लेकॉर्नु के इस्तीफे के बाद दक्षिणपंथी पार्टी "नेशनल रैली" (Rassemblement National) के नेता जॉर्डन बार्डेला ने राष्ट्रपति मैक्रों से नेशनल असेंबली को भंग करने और फ्रेश इलेक्शन कराने की मांग की है.
विश्लेषकों का मानना है कि अगर मौजूदा गतिरोध जल्द नहीं सुलझा, तो राष्ट्रपति को संसद भंग करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा. इससे फ्रांस में राजनीतिक स्थिरता के लिए एक बड़ा संकट खड़ा हो सकता है.
इस्तीफे की वजह साफ नहीं, लेकिन संकेत स्पष्ट
हालांकि सेबास्टियन लेकोर्नु के इस्तीफे का कोई आधिकारिक कारण नहीं बताया गया है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा है कि इसका सीधा संबंध मंत्रिमंडल के गठन से है.
लेकॉर्नु ने जिन मंत्रियों को चुना था, उनमें से अधिकतर पहले की सरकारों का हिस्सा रह चुके थे. इससे नई ऊर्जा और दिशा देने की अपेक्षा टूट गई, और आलोचकों ने इसे "पुनरावृत्ति वाली सरकार" बताया.
इसके अलावा, कई सहयोगी दलों ने बजट प्रस्ताव और प्रमुख नीतियों पर समर्थन देने से इनकार कर दिया, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि अल्पमत में चल रही सरकार के पास जरूरी समर्थन नहीं है.
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