नेपाल में GEN-Z के साथ हो गया खेल! पूर्व पीएम प्रचंड ने बनाया रेड फ्रंट, नौ वामपंथी दल आएं एक साथ

Nepal Communist Alliance: नेपाल की राजनीति में एक बार फिर बड़ा बदलाव देखने को मिला है. देश के पूर्व प्रधानमंत्री और सीपीएन (माओवादी सेंटर) के प्रमुख पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ ने आठ अन्य वामपंथी दलों को साथ लाकर एक नया गठबंधन बनाया है, जिसे ‘रेड फ्रंट’ या ‘रेड यूनिटी’ कहा जा रहा है.

game is over with GEN-Z in Nepal  Former PM Prachanda formed Red Front nine leftist parties together
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Nepal Communist Alliance: नेपाल की राजनीति में एक बार फिर बड़ा बदलाव देखने को मिला है. देश के पूर्व प्रधानमंत्री और सीपीएन (माओवादी सेंटर) के प्रमुख पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ ने आठ अन्य वामपंथी दलों को साथ लाकर एक नया गठबंधन बनाया है, जिसे ‘रेड फ्रंट’ या ‘रेड यूनिटी’ कहा जा रहा है. यह एकता नेपाल में वामपंथी राजनीति को पुनर्जीवित करने का प्रयास मानी जा रही है, लेकिन सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या यह नया मोर्चा सिर्फ सत्ता की राजनीति तक सीमित रहेगा या जनता की बदलती उम्मीदों को भी समझ पाएगा.

काठमांडू के पेरिसडांडा में रविवार को यह ऐतिहासिक समझौता हुआ. इस मौके पर सीपीएन (माओवादी सेंटर), सीपीएन (यूनिफाइड सोशलिस्ट) और सात अन्य वामपंथी पार्टियों ने एकता पत्र पर हस्ताक्षर किए. इस प्रक्रिया में माओवादी नेता प्रचंड और यूनिफाइड सोशलिस्ट के नेता माधव कुमार नेपाल मुख्य भूमिका में रहे. जनसमाजवादी पार्टी नेपाल के प्रमुख सुबासराज काफ्ले, नेपाल सोशलिस्ट पार्टी के महेंद्र राय यादव, सीपीएन जनरल सेक्रेटरी चिरण पुन, सीपीएन सोशलिस्ट के राजू कार्की, सीपीएन माओवादी सोशलिस्ट के कर्णजीत बुधाथोकी और सीपीएन कम्युनिस्ट के प्रेम बहादुर सिंह भी इसमें शामिल हुए. 

अगले ही दिन सीपीएन (रिवॉल्यूशनरी माओवादी) के संयोजक गोपाल किर्ति ने भी इस समझौते पर हस्ताक्षर किए. इसके साथ ही कुल नौ वामपंथी दल अब इस नए मोर्चे का हिस्सा बन गए हैं.

युवाओं के आंदोलन ने बदली नेपाल की राजनीति

यह एकता उस समय सामने आई है जब नेपाल में Gen-Z आंदोलन यानी युवाओं के भ्रष्टाचार-विरोधी अभियान ने देश की राजनीति की दिशा ही बदल दी है. इस आंदोलन के कारण सीपीएन-यूएमएल की सरकार गिर गई थी. सोशल मीडिया पर सक्रिय युवाओं ने पुराने नेताओं और वंशवाद के खिलाफ खुला मोर्चा खोल दिया है. ऐसे में वामपंथी दलों की यह नई पहल यह संकेत देती है कि वे अपनी गिरती साख को संभालने और युवा मतदाताओं को साधने की कोशिश कर रहे हैं.

क्या यह पुरानी ताकत की वापसी है या नई चुनौती?

प्रचंड और माधव कुमार नेपाल का कहना है कि यह गठबंधन वामपंथी आंदोलन को खत्म होने से बचाने की दिशा में कदम है. उनका दावा है कि बिखरे हुए वोटों को एक मंच पर लाकर जनता को स्थिर और मजबूत विकल्प दिया जाएगा.

हालांकि राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस एकता का प्रभाव तभी दिखेगा जब यह मोर्चा युवाओं की असल समस्याओं, जैसे बेरोजगारी, पारदर्शिता और जवाबदेही पर काम करेगा. केवल विचारधारा या नेताओं के जुड़ने से कोई बदलाव नहीं आएगा.

काठमांडू पोस्ट से बातचीत में लेफ्ट एनालिस्ट हरी रोका ने कहा कि राजनीतिक ताकत जनता के मुद्दों से आती है, न कि गठबंधनों से. जब तक ये पार्टियां लोगों की रोजमर्रा की परेशानियों का समाधान नहीं करेंगी, तब तक इस एकता का कोई मतलब नहीं है.

अंदरूनी मतभेद से कमजोर पड़ता मोर्चा

‘रेड यूनिटी’ की घोषणा के कुछ घंटे बाद ही इस मोर्चे में मतभेद सामने आने लगे. माओवादी सेंटर के वरिष्ठ नेता जनार्दन शर्मा, यूनिफाइड सोशलिस्ट के वरिष्ठ नेता झलनाथ खनाल और महासचिव घनश्याम भूषण ने कहा कि वे इस प्रक्रिया का हिस्सा नहीं होंगे.

इन नेताओं का तर्क है कि यह एकता बिना किसी स्पष्ट नीतिगत ढांचे और जनता से जुड़ने की रणनीति के बनाई गई है. उनका कहना है कि यह गठबंधन विचारधारा की एकजुटता नहीं बल्कि सत्ता की राजनीति का परिणाम है. साथ ही यह भी चिंता जताई जा रही है कि माधव कुमार नेपाल, जो भ्रष्टाचार के एक मामले का सामना कर रहे हैं, उनके साथ खड़ा होना जनता में गलत संदेश भेज सकता है.

Gen-Z युवाओं की नाराजगी

नेपाल के युवा इस नई राजनीतिक एकता से खासे निराश हैं. सोशल मीडिया पर “No Not Again Politics” जैसे अभियानों ने यह साफ कर दिया है कि जनता अब पुराने चेहरों से बदलाव की उम्मीद नहीं कर रही.

काठमांडू विश्वविद्यालय की एक छात्रा ने कहा कि अगर बार-बार वही नेता लौटते रहेंगे तो नया नेपाल कैसे बनेगा? अब जनता जागरूक है, डिजिटल युग में किसी की भी छवि छिप नहीं सकती.

राजनीतिक विश्लेषक भीम भुर्टेल का कहना है कि आज का दौर विचारधारा से ज्यादा डिजिटल कनेक्शन और युवाओं की भागीदारी का है. पुरानी कम्युनिस्ट पार्टियां सोशल मीडिया और तकनीकी बदलावों की गति को नहीं समझ पा रही हैं, और यही उनकी सबसे बड़ी कमजोरी है.

क्या लौटेगा नेपाल में रेड एरा?

वामपंथी खेमे के कुछ नेता अब भी मानते हैं कि यह एकता कम्युनिस्ट आंदोलन को फिर से जीवित कर सकती है. माओवादी सेंटर के नेता युवराज चौलागाईं का कहना है कि अगर यह गठबंधन सही दिशा में आगे बढ़ा और जनता के असली मुद्दों को अपनाया, तो वामपंथी राजनीति फिर से प्रभावी हो सकती है. लेकिन उन्होंने यह भी माना कि अगर यह सिर्फ सत्ता और पदों की राजनीति तक सीमित रहा, तो जनता इसे पूरी तरह खारिज कर देगी.

भारत के लिए इस एकता का मतलब

नेपाल की यह नई वामपंथी एकता भारत के लिए भी रणनीतिक रूप से अहम है. नेपाल हमेशा से भारत की सुरक्षा और विदेश नीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है. अगर यह रेड फ्रंट मजबूत होता है, तो भारत-नेपाल संबंधों में नए समीकरण बन सकते हैं, खासकर तब जब चीन नेपाल में अपनी राजनीतिक और आर्थिक पकड़ बढ़ाने की कोशिश कर रहा है.

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को इस नई स्थिति को संतुलित तरीके से संभालना होगा, ताकि दक्षिण एशिया में उसकी रणनीतिक स्थिति पर कोई नकारात्मक असर न पड़े.

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