ऑनलाइन फूड डिलीवरी सेक्टर की दिग्गज कंपनी Zomato एक बार फिर विवादों के घेरे में आ गई है. इस बार चर्चा की वजह कंपनी के सीईओ दीपिंदर गोयल का एक सोशल मीडिया पोस्ट है, जिसमें उन्होंने डिलीवरी पार्टनर्स की कमाई और काम के हालात को लेकर बड़े दावे किए. लेकिन जैसे ही यह पोस्ट सामने आई, गिग वर्कर्स संगठनों ने इसे जमीनी सच्चाई से कोसों दूर बताते हुए तीखी प्रतिक्रिया दे दी.
दीपिंदर गोयल ने X (पूर्व ट्विटर) पर एक विस्तृत पोस्ट शेयर करते हुए कहा कि साल 2025 में Zomato के डिलीवरी पार्टनर्स की औसत कमाई 102 रुपये प्रति घंटा रही. उनके मुताबिक, कंपनी न तो डिलीवरी पार्टनर्स से जरूरत से ज्यादा काम कराती है और न ही किसी तरह का शोषण होता है.गोयल ने उदाहरण देते हुए लिखा कि अगर कोई डिलीवरी पार्टनर रोज 10 घंटे और महीने में 26 दिन काम करता है, तो उसकी ग्रॉस कमाई करीब 26,500 रुपये होती है. ईंधन और वाहन मेंटेनेंस जैसे खर्च निकालने के बाद भी उसे लगभग 21,000 रुपये की नेट इनकम मिलती है.
पार्ट-टाइम मॉडल पर जोर, फुल-टाइम सुविधाओं से इनकार
Zomato CEO ने यह भी कहा कि प्लेटफॉर्म पर काम करने वाले ज्यादातर डिलीवरी पार्टनर्स पार्ट-टाइम होते हैं. उनके अनुसार, सिर्फ 2.3 प्रतिशत लोग ही साल में 250 दिनों से ज्यादा काम करते हैं. गोयल ने साफ किया कि गिग इकॉनमी को फुल-टाइम नौकरी की तरह नहीं देखा जाना चाहिए, इसलिए पीएफ, फिक्स सैलरी या अन्य पारंपरिक सुविधाओं की मांग व्यवहारिक नहीं है.
यूनियनों का पलटवार: आंकड़ों की सच्चाई कुछ और
हालांकि, तेलंगाना गिग एंड प्लेटफॉर्म वर्कर्स यूनियन ने इन दावों पर कड़ा विरोध जताया है. यूनियन का कहना है कि 21,000 रुपये की नेट इनकम 260 घंटे काम करने के बाद मिलती है, यानी वास्तविक प्रति घंटे कमाई सिर्फ 81 रुपये के आसपास बैठती है.यूनियन ने यह भी आरोप लगाया कि इस कमाई के बदले डिलीवरी पार्टनर्स को न तो पेड लीव, न सोशल सिक्योरिटी, न हेल्थ इंश्योरेंस और न ही एक्सीडेंट कवर मिलता है.
टिप्स और ऑर्डर का सच
गिग वर्कर्स संगठनों के अनुसार, टिप्स को लेकर भी तस्वीर उतनी अच्छी नहीं है जितनी दिखाई जाती है. यूनियन का दावा है कि औसतन टिप्स से होने वाली कमाई महज 2.6 रुपये प्रति घंटा है और सिर्फ 5 प्रतिशत ऑर्डर्स पर ही ग्राहकों से टिप मिलती है.
तेज डिलीवरी का दबाव और सड़क सुरक्षा का खतरा
गिग वर्कर्स ने 10 और 20 मिनट की डिलीवरी के बढ़ते ट्रेंड पर भी चिंता जताई है. उनका कहना है कि क्विक कॉमर्स मॉडल के चलते डिलीवरी पार्टनर्स पर समय का भारी दबाव रहता है, जिससे सड़क हादसों का खतरा बढ़ गया है.हालांकि, दीपिंदर गोयल ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि 10 मिनट की डिलीवरी का मतलब तेज रफ्तार नहीं, बल्कि स्टोर्स की बेहतर लोकेशन और नजदीकी है. उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ऐप में किसी तरह का काउंटडाउन टाइमर नहीं दिखाया जाता, जिससे ड्राइवरों पर अतिरिक्त दबाव पड़े.
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