Rice Crisis: दुनिया पर मंडरा रहा चावल संकट, पैदावार घटने से बढ़ सकती हैं कीमतें, क्या होगा असर?

दुनिया भर में करोड़ों लोगों की थाली का सबसे अहम हिस्सा माने जाने वाले चावल को लेकर चिंता बढ़ती जा रही है. आने वाले समय में वैश्विक स्तर पर चावल की पैदावार में गिरावट देखने को मिल सकती है.

Global Rice Production Decline Rice crisis Challenges For India
प्रतिकात्मक तस्वीर/ AI

Rice Crisis: दुनिया भर में करोड़ों लोगों की थाली का सबसे अहम हिस्सा माने जाने वाले चावल को लेकर चिंता बढ़ती जा रही है. आने वाले समय में वैश्विक स्तर पर चावल की पैदावार में गिरावट देखने को मिल सकती है. अमेरिकी कृषि विभाग (USDA) की रिपोर्ट के अनुसार साल 2026-27 के सीजन में दुनिया में चावल उत्पादन कम होने का अनुमान है. अगर ऐसा होता है तो यह पिछले 11 साल में पहली बार होगा जब वैश्विक चावल उत्पादन में गिरावट दर्ज की जाएगी.

रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर में चावल का उत्पादन आगामी सीजन में करीब 538 मिलियन टन रहने का अनुमान है. हालांकि लगातार बढ़ती खपत और वैश्विक व्यापार की मांग के मुकाबले यह उत्पादन कम माना जा रहा है. विशेषज्ञों का कहना है कि अगर उत्पादन में गिरावट और खपत में बढ़ोतरी का यह अंतर बना रहा तो आने वाले महीनों में दुनिया के कई देशों में चावल की कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं.

किन देशों में सबसे ज्यादा असर?

USDA की रिपोर्ट में भारत, म्यांमार और अमेरिका को उन प्रमुख देशों में शामिल किया गया है जहां चावल उत्पादन में सबसे ज्यादा गिरावट देखने को मिल सकती है.

अमेरिका में किसानों द्वारा धान की बुवाई कम किए जाने की वजह से उत्पादन में लगभग 15 फीसदी तक की कमी का अनुमान लगाया गया है. वहीं एशिया के कई देशों में बढ़ती खेती लागत और मौसम की अनिश्चितता भी उत्पादन को प्रभावित कर सकती है.

विशेषज्ञों का मानना है कि चावल की रिकॉर्ड खपत के बीच अगर उत्पादन कम रहता है, तो वैश्विक भंडार तेजी से घट सकता है. इसका असर सीधे आम लोगों की रसोई और खाद्य कीमतों पर पड़ेगा.

पैदावार घटने के पीछे दो बड़े कारण

1. ईरान युद्ध और बढ़ती लागत

वैश्विक स्तर पर ऊर्जा और उर्वरक की कीमतों में तेज बढ़ोतरी को चावल संकट का बड़ा कारण माना जा रहा है. ईरान में जारी तनाव और युद्ध की स्थिति के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल और गैस की कीमतें प्रभावित हुई हैं.

धान की खेती में बड़ी मात्रा में उर्वरक का इस्तेमाल होता है. ऐसे में खाद और ईंधन की बढ़ती कीमतों ने किसानों की लागत बढ़ा दी है. एशिया के कई देशों में किसान इस बार कम बुवाई करने पर विचार कर रहे हैं क्योंकि खेती पहले की तुलना में काफी महंगी हो चुकी है.

2. अल नीनो और कमजोर मानसून की आशंका

दुनिया के सबसे बड़े चावल उत्पादक देशों में शामिल भारत के लिए भी यह स्थिति चुनौतीपूर्ण मानी जा रही है. मौसम विशेषज्ञों के अनुसार इस बार मानसून पर अल नीनो का असर पड़ सकता है.

अगर जून से शुरू होने वाला मानसून सामान्य से कमजोर रहता है, तो धान की खेती सीधे प्रभावित हो सकती है. भारत में धान उत्पादन काफी हद तक बारिश पर निर्भर करता है. ऐसे में कम बारिश होने पर उत्पादन घटने की आशंका बढ़ जाएगी.

चावल की कीमतों में दिखने लगा असर

चावल की संभावित कमी का असर अब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों पर भी दिखाई देने लगा है. एशिया में बेंचमार्क माने जाने वाले थाई चावल की थोक कीमतों में मार्च के अंत से अब तक करीब 15 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है.

इसके अलावा शिकागो बोर्ड ऑफ ट्रेड में चावल के वायदा कारोबार (Futures) में भी तेजी देखने को मिली है. पिछले सप्ताह चावल का फ्यूचर्स प्राइस करीब 8 फीसदी उछला, जिसे दो साल में सबसे बड़ी साप्ताहिक बढ़त माना जा रहा है.

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर उत्पादन में गिरावट जारी रहती है तो आने वाले महीनों में चावल और उससे जुड़े खाद्य उत्पादों की कीमतों में और तेजी आ सकती है.

एशियाई देशों पर सबसे ज्यादा असर

एशिया के कई देशों में चावल सिर्फ भोजन नहीं बल्कि लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी और अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा है. भारत, फिलीपींस, बांग्लादेश, वियतनाम, थाईलैंड और इंडोनेशिया जैसे देशों में बड़ी आबादी चावल पर निर्भर है.

चावल की कीमतों में तेजी का असर सीधे खाद्य मुद्रास्फीति पर पड़ता है. फिलीपींस जैसे देशों में खाद्य महंगाई पहले ही बढ़ने लगी है. अगर वैश्विक आपूर्ति और कम होती है तो गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ सकता है.

भारत के सामने क्या चुनौती?

भारत दुनिया के सबसे बड़े चावल उत्पादकों और निर्यातकों में शामिल है. ऐसे में वैश्विक उत्पादन घटने की स्थिति में भारत की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो सकती है.

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को घरेलू जरूरतों और निर्यात के बीच संतुलन बनाकर चलना होगा. अगर मानसून कमजोर रहता है और उत्पादन प्रभावित होता है, तो सरकार को भंडारण और निर्यात नीति को लेकर बड़े फैसले लेने पड़ सकते हैं.

दूसरी ओर वैश्विक बाजार में चावल की कमी बढ़ने पर भारतीय निर्यात की मांग भी बढ़ सकती है. ऐसे में आने वाले महीनों में मौसम, उत्पादन और अंतरराष्ट्रीय हालात पर दुनिया की नजर बनी रहेगी.

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