भारत और रूस के बीच दशकों पुरानी रणनीतिक साझेदारी एक बार फिर नए दौर में प्रवेश करने वाली है. अगले महीने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की प्रस्तावित भारत यात्रा से पहले दोनों देश उच्च स्तरीय तैयारियों में जुटे हैं. नई दिल्ली और मॉस्को के बीच इस तेज़ कूटनीतिक हलचल को द्विपक्षीय संबंधों में एक अहम मोड़ के रूप में देखा जा रहा है.
विदेश मंत्री एस. जयशंकर सोमवार को मॉस्को पहुँचे, जहाँ उन्होंने रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव के साथ विस्तृत बातचीत की. यह बैठक सिर्फ एक नियमित संवाद नहीं थी, बल्कि इसमें पुतिन की आगामी भारत यात्रा से जुड़े मसलों पर खास ध्यान दिया गया.जयशंकर ने अपनी प्रारंभिक टिप्पणियों में इस बात पर जोर दिया कि राष्ट्रपति पुतिन की 23वीं वार्षिक शिखर बैठक के लिए प्रस्तावित यात्रा दोनों देशों के संबंधों को नई ऊंचाई देगी. उन्होंने कहा कि आर्थिक, रक्षा, ऊर्जा, तकनीक और औद्योगिक सहयोग से जुड़ी अनेक परियोजनाएँ और समझौते अंतिम चरण में हैं और उम्मीद है कि अगले कुछ दिनों में उन पर मुहर लग जाएगी.
रणनीतिक साझेदारी को और मज़बूती देंगे नए फैसले
वार्ता के दौरान जयशंकर ने स्पष्ट रूप से कहा कि आगामी समझौते भारत–रूस के ‘‘विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी’’ को और गहराई देंगे. यह वही साझेदारी है जिसने दोनों देशों को ऊर्जा सहयोग, सैन्य तकनीक, अंतरिक्ष अनुसंधान और वैश्विक कूटनीतिक मुद्दों पर एक-दूसरे का भरोसेमंद साथी बनाया है. जयशंकर ने यूक्रेन संघर्ष पर भी भारत की स्थिर और संतुलित स्थिति दोहराई. उन्होंने कहा कि शांति की दिशा में हालिया प्रयासों का भारत समर्थन करता है और चाहتا है कि सभी पक्ष रचनात्मक समाधान की तरफ आगे बढ़ें.
दिसंबर की शुरुआत में भारत आ सकते हैं पुतिन
मॉस्को में जयशंकर की यह यात्रा पुतिन की आगामी भारत यात्रा की तैयारियों का अहम हिस्सा मानी जा रही है. रूसी राष्ट्रपति के 5 दिसंबर के आसपास नई दिल्ली आने की संभावना है, जहाँ उनकी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ वार्षिक शिखर वार्ता होगी.यह बैठक इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पहले दोनों देशों के बीच 22 वार्षिक शिखर सम्मेलन सफलतापूर्वक सम्पन्न हो चुके हैं, जिन्होंने रक्षा, व्यापार, विज्ञान और अंतरिक्ष सहयोग को नई दिशा दी है.
दोनों देशों को बड़े परिणामों की उम्मीद
इस बार की बैठक को ऊर्जा सुरक्षा, सैन्य आपूर्ति, कनेक्टिविटी, भुगतान प्रणालियों, आर्कटिक सहयोग और नए औद्योगिक निवेश जैसे मुद्दों के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा भू-राजनीतिक परिस्थितियों में भारत–रूस साझेदारी की मजबूती क्षेत्रीय और वैश्विक संतुलन पर भी असर डाल सकती है.
यह भी पढ़ें: जेलेंस्की से पुतिन ने लिया बदला... 580 ड्रोन, 40 मिसाइलें और 20 से ज्यादा धमाकों से धुआं-धुआं हुआ यूक्रेन