समुद्र में भारत की ताकत देखेगी दुनिया, इंडियन नेवी के लिए तैयार हो रही ऑटोनोमस सबमरीन, जानें खासियत

भारत अब अपनी नौसेना के लिए पहली बार ऑटोनोमस सबमरीन विकसित कर रहा है, जो आने वाले समय में सुरक्षा और निगरानी के क्षेत्र में एक अहम बदलाव ला सकती है. यह सबमरीन पूरी तरह से भारतीय डिजाइन और तकनीकी विशेषज्ञता का परिणाम होगी, और इसे स्वदेशी कंपनी Rekise Marine द्वारा निर्मित किया जाएगा.

India first autonomous submarine designed by the Navy and built by an Indian company
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नई दिल्ली: भारत अब अपनी नौसेना के लिए पहली बार ऑटोनोमस सबमरीन विकसित कर रहा है, जो आने वाले समय में सुरक्षा और निगरानी के क्षेत्र में एक अहम बदलाव ला सकती है. यह सबमरीन पूरी तरह से भारतीय डिजाइन और तकनीकी विशेषज्ञता का परिणाम होगी, और इसे स्वदेशी कंपनी Rekise Marine द्वारा निर्मित किया जाएगा. इस परियोजना को लेकर भारतीय नौसेना ने एक साल पहले ही Rekise Marine से एक समझौता किया था, और अगले एक साल में इसका प्रोटोटाइप तैयार हो जाएगा. इस तकनीकी कदम से भारत चुनिंदा देशों के साथ खड़ा हो जाएगा, जिनके पास इस तरह की उच्च-तकनीकी ऑटोनोमस सबमरीन हैं, जैसे अमेरिका, रूस और चीन.

भारत में पहली बार ऑटोनोमस सबमरीन का निर्माण

Rekise Marine के को-फाउंडर और रिटायर्ड रियर एडमिरल शेखर मित्तल ने NBT से बातचीत करते हुए इस प्रोजेक्ट के बारे में विस्तार से बताया. उन्होंने कहा कि इस परियोजना का अनुबंध करीब एक साल पहले भारतीय नौसेना के साथ साइन किया गया था. यह दो साल का कॉन्ट्रैक्ट है, और अगले एक साल में इस ऑटोनोमस सबमरीन का प्रोटोटाइप तैयार कर दिया जाएगा. मित्तल ने यह भी बताया कि इस प्रोजेक्ट में लगभग 70 प्रतिशत काम पूरा हो चुका है. भारतीय नौसेना के लिए यह एक बड़ा कदम है, क्योंकि अब तक सिर्फ कुछ देशों के पास ही इस तरह की ऑटोनोमस सबमरीन तकनीक उपलब्ध थी.

स्वदेशी निर्माण: सुरक्षा और तकनीकी भरोसा

शेखर मित्तल ने इस बात पर जोर दिया कि इस सबमरीन का डिजाइन, तकनीक और सॉफ्टवेयर पूरी तरह से भारत में ही विकसित किए जा रहे हैं, जिससे इस प्रणाली में किसी भी प्रकार के स्पाईवेयर का खतरा नहीं रहेगा. उन्होंने कहा कि जब तकनीक और सॉफ़्टवेयर विदेशों से लिए जाते हैं, तो उसमें सुरक्षा संबंधी जोखिम हो सकते हैं, जो इस स्वदेशी निर्माण के जरिए पूरी तरह से कम किए जा रहे हैं.

45 दिन तक पानी के नीचे रुकने की क्षमता

इस ऑटोनोमस सबमरीन की एक खासियत यह होगी कि यह 45 दिनों तक पानी के भीतर बिना किसी रुकावट के कार्य कर सकती है. यह भारतीय समुद्री क्षेत्र में चुपचाप बैठकर हर गतिविधि पर नजर रखेगी और निगरानी का कार्य करेगी. इसके अलावा, इसमें मानव चालक दल की आवश्यकता नहीं होगी, जिससे इसकी लागत भी बहुत कम होगी. शेखर मित्तल ने बताया कि एक पारंपरिक सबमरीन की कीमत में लगभग 100 ऑटोनोमस सबमरीन बनाई जा सकती हैं.

आकार में लचीलापन और उच्च तकनीकी क्षमता

इस सबमरीन की वर्तमान लंबाई 11 मीटर है, लेकिन भविष्य में इसे बढ़ाकर 15 से 17 मीटर तक किया जा सकता है. इसके अलावा, इसमें किसी भी प्रकार के पेलोड जैसे माइंस और टारपीडो भी लगाए जा सकते हैं, जिससे इसकी सैन्य क्षमता और बढ़ जाएगी. इस तरह की लचीलापन इसे न केवल निगरानी, बल्कि सैन्य अभियानों के लिए भी उपयुक्त बनाएगी.

भविष्य में लगातार निर्माण

शेखर मित्तल ने यह भी कहा कि इस प्रोटोटाइप के सफल परीक्षण के बाद, भारतीय नौसेना को हर कुछ महीनों में एक नई ऑटोनोमस सबमरीन मिलेगी. इसका मतलब है कि यह परियोजना भारतीय नौसेना की ताकत में महत्वपूर्ण योगदान देने वाली है, और भविष्य में भारतीय समुद्री क्षेत्र की सुरक्षा और निगरानी के लिए एक मजबूत कदम साबित होगी.

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