नई दिल्ली: भारत ने एशिया में एक बड़ा कूटनीतिक कदम उठाते हुए अफगानिस्तान के साथ अपने रिश्तों को एक नई दिशा दे दी है. लंबे समय तक तालिबान शासन से दूरी बनाकर रखने के बाद, अब भारत ने काबुल में फिर से पूर्ण दूतावास खोलने का ऐलान किया है. विदेश मंत्री एस. जयशंकर की अगुआई में इस निर्णय के पीछे स्पष्ट संकेत है कि भारत, अफगानिस्तान में फिर से अपना प्रभाव स्थापित करने की योजना पर तेज़ी से काम कर रहा है.
यह फैसला सिर्फ भारत-अफगानिस्तान संबंधों तक सीमित नहीं है. यह एक बहुआयामी रणनीति है, जिसका सीधा असर अमेरिका, चीन और पाकिस्तान जैसे तीनों प्रमुख देशों के क्षेत्रीय हितों पर पड़ेगा.
भारत और तालिबान: राजनयिक संबंधों की शुरुआत
2021 में तालिबान के सत्ता में आने के बाद भारत ने अपने राजनयिक स्टाफ को काबुल से वापस बुला लिया था और वहां स्थित दूतावास को बंद कर दिया गया था. इसके बाद चार साल तक भारत ने सार्वजनिक तौर पर तालिबान सरकार को मान्यता नहीं दी. लेकिन अब, विदेश मंत्री एस. जयशंकर द्वारा काबुल स्थित भारतीय मिशन को "पूर्ण दूतावास" का दर्जा देने का ऐलान एक बड़ी रणनीतिक शिफ्ट को दर्शाता है.
Highlights of EAM @DrSJaishankar’s remarks at meeting with Afghan FM Mawlawi Amir Khan Muttaqi in New Delhi. pic.twitter.com/JzEw8apD6L
— Randhir Jaiswal (@MEAIndia) October 10, 2025
यह फैसला तब आया जब तालिबान के कार्यवाहक विदेश मंत्री आमिर खान मुत्ताकी ने नई दिल्ली का दौरा किया और जयशंकर से मुलाकात की. यह पहली बार है जब किसी तालिबान मंत्री ने भारत का आधिकारिक दौरा किया और इसे द्विपक्षीय संबंधों में एक नई शुरुआत माना जा रहा है.
As announced by EAM @DrSJaishankar during the meeting with FM Mawlawi Amir Khan Muttaqi of Afghanistan today, India has delivered additional food supplies as part of its ongoing humanitarian assistance to those affected by the earthquake. pic.twitter.com/l0ezCBj1Eo
— Randhir Jaiswal (@MEAIndia) October 10, 2025
भारत की अफगानिस्तान में रणनीतिक दिलचस्पी
भारत का अफगानिस्तान से जुड़ाव केवल राजनीतिक या कूटनीतिक नहीं, बल्कि रणनीतिक और आर्थिक हितों से भी जुड़ा है:
मध्य एशिया तक संपर्क का विकल्प
पाकिस्तान, भारत को मध्य एशिया तक भौगोलिक पहुंच की इजाज़त नहीं देता. ऐसे में भारत के लिए ईरान के चाबहार बंदरगाह और अफगानिस्तान के ज़रिए एक वैकल्पिक मार्ग बेहद अहम है.
आतंकवाद पर नियंत्रण
अफगानिस्तान में मौजूद आतंकी संगठनों जैसे TTP, ISKP, लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद की गतिविधियाँ भारत के लिए गंभीर सुरक्षा चिंता का विषय हैं. तालिबान से संवाद बनाकर भारत इन पर निगरानी और नियंत्रण की दिशा में कदम उठा सकता है.
चीन और पाकिस्तान का प्रभाव
अफगानिस्तान में चीन 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI)' के ज़रिए अपने पांव जमा रहा है और पाकिस्तान वहां पहले से मौजूद है. भारत नहीं चाहता कि अफगानिस्तान पूरी तरह इन दोनों देशों के प्रभाव में चला जाए.
तालिबान के लिए भी क्यों अहम है भारत?
तालिबान शासन को अभी तक वैश्विक स्तर पर सीमित मान्यता ही मिली है. हालांकि चीन, रूस और ईरान जैसे देशों ने तालिबान से संपर्क बनाए रखा है, फिर भी भारत जैसी क्षेत्रीय शक्ति का समर्थन उनके लिए बड़ी कूटनीतिक सफलता है. भारत:
इसलिए तालिबान भारत के साथ संबंध सुधारने को लेकर गंभीर है और यहां तक कि उसने भारत में अपने प्रतिनिधि की नियुक्ति की इच्छा भी जताई है.
भारत की अफगान नीति में बदलाव
काबुल में फिर से भारत की मौजूदगी
पाकिस्तान के लिए मुश्किलें
चीन की भूमिका सीमित करने की कोशिश
भारत नहीं चाहता कि अफगानिस्तान पूरी तरह चीन की गोद में चला जाए, इसलिए वह अब सक्रियता से अपनी मौजूदगी दर्ज करवा रहा है.
अमेरिका की स्थिति: लौटने की कोशिशें
अमेरिका, जिसने 2021 में अफगानिस्तान से सैन्य वापसी की थी, अब फिर से इस क्षेत्र में रुचि दिखा रहा है:
भारत इस स्थिति में अमेरिका के दोबारा अफगानिस्तान लौटने के पक्ष में नहीं है, क्योंकि इससे वहां की स्थिरता और भारत की मौजूदा रणनीति दोनों प्रभावित हो सकते हैं.
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