इस देश को कपड़ा बेचकर अमेरिकी घाटे की भरपाई करेगा भारत, मिल गया ट्रंप के टैरिफ वार से बचाने वाला ढाल

जब दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अचानक अपनी व्यापारिक नीतियों में बदलाव करती है, तो उसका असर सिर्फ एक देश पर नहीं, बल्कि पूरे वैश्विक व्यापार पर पड़ता है.

India will compensate US losses by selling clothes to UK
प्रतिकात्मक तस्वीर/ ANI

नई दिल्ली: जब दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अचानक अपनी व्यापारिक नीतियों में बदलाव करती है, तो उसका असर सिर्फ एक देश पर नहीं, बल्कि पूरे वैश्विक व्यापार पर पड़ता है. कुछ ऐसा ही हुआ है अमेरिका के उस फैसले के बाद, जिसमें उसने भारतीय उत्पादों पर 50% तक का टैरिफ लागू कर दिया. इस फैसले ने भारत के कई प्रमुख सेक्टरों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं. खासकर टेक्सटाइल इंडस्ट्री, जो सालों से अमेरिका को सबसे बड़ा एक्सपोर्ट करती आ रही है.

लेकिन इस तूफान के बीच एक राहत की खबर भी आई है. यह राहत आई है ब्रिटेन के साथ हुए फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) के रूप में. ये डील भारत को उस चोट से उबार सकती है, जो उसे ट्रंप की टैरिफ तलवार ने दी है.

ब्रिटेन से बनी उम्मीद की डोर

अमेरिका भले ही भारत के लिए सबसे बड़ा टेक्सटाइल एक्सपोर्ट मार्केट रहा हो, लेकिन अब ब्रिटेन इस खाली जगह को भरने की काबिलियत रखता है. भारत और ब्रिटेन के बीच जो नया व्यापार समझौता हुआ है, उसने रेडीमेड गारमेंट (RMG) और होम टेक्सटाइल सेक्टर को एक नई सांस दी है.

CareEdge Ratings की रिपोर्ट के मुताबिक, यह समझौता भारत को ब्रिटेन के लगभग 23 अरब डॉलर के इम्पोर्ट बाजार में प्रतिस्पर्धी देशों के मुकाबले मजबूत स्थिति में ला सकता है. यानी, जहां एक ओर अमेरिका ने दरवाज़ा बंद किया, वहीं ब्रिटेन ने अपने बाज़ार का स्वागत द्वार खोल दिया.

चुनौतियां हैं... लेकिन तैयारी भी पूरी

इस बदलाव के बीच CareEdge के विशेषज्ञों का मानना है कि 2026 तक टेक्सटाइल एक्सपोर्ट में 9-10% की गिरावट आ सकती है. इसका कारण अमेरिका में बढ़ा हुआ टैरिफ और वहां की कीमतों पर पड़ने वाला असर होगा.

लेकिन इस गिरावट को सरकार ने पहले ही पहचान लिया है और इससे निपटने के लिए कई कदम उठाए जा रहे हैं. मसलन, कॉटन पर 10% इम्पोर्ट ड्यूटी को 31 दिसंबर 2025 तक हटाना, 40 नए देशों के साथ व्यापार को बढ़ावा देने के लिए आउटरीच प्रोग्राम, और इंटरेस्ट सब्सिडी जैसे उपाय इस उद्योग को नई ऊर्जा देने में मदद करेंगे.

भारत के पास है ताकतवर 'बैकवर्ड इंटीग्रेशन'

भारत की सबसे बड़ी ताकत है उसका बैकवर्ड इंटीग्रेशन यानी हम सिर्फ रेडीमेड गारमेंट नहीं बनाते, बल्कि उनके लिए जरूरी कॉटन यार्न और फैब्रिक भी खुद ही तैयार करते हैं. इसकी वजह से भारत टेक्सटाइल वैल्यू चेन में मजबूती से खड़ा है, जबकि कई प्रतिस्पर्धी देश इस सुविधा से वंचित हैं.

यही कारण है कि जहां एक ओर RMG और होम टेक्सटाइल एक्सपोर्ट में गिरावट की आशंका है, वहीं दूसरी ओर यार्न और फैब्रिक के एक्सपोर्ट में उछाल आ सकता है. इससे उद्योग की आर्थिक सेहत को संतुलन में रखा जा सकेगा.

टैक्टिक्स से नहीं, टारगेट से लड़ेगा वार

सरकार और उद्योग जगत दोनों ने ये स्पष्ट कर दिया है कि वे इस चुनौती से घबराने वाले नहीं हैं. अमेरिकी टैरिफ भले ही तात्कालिक नुकसान पहुंचाए, लेकिन लंबी अवधि में FTA, विविधता वाले बाजार, और सरकारी सहयोग भारत को और अधिक सशक्त बनाएंगे.

यूरोपियन यूनियन के साथ चल रही ट्रेड बातचीत भी एक बड़ी उम्मीद है. अगर यह समझौता होता है, तो भारत के टेक्सटाइल उत्पादों को और ज्यादा वैश्विक बाज़ार मिलेंगे और अमेरिकी निर्भरता भी कम होगी.

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