नई दिल्ली/तेल अवीव: इज़राइल का एक ऐतिहासिक शहर हाइफा भारत के बहादुर सैनिकों की वीरता का गवाह है. आज से करीब एक सदी पहले, भारतीय घुड़सवारों ने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान इस शहर को तुर्की के ओटोमन शासन से आज़ादी दिलाई थी. अब इज़राइल ने इस योगदान को सार्वजनिक रूप से स्वीकारते हुए, इतिहास के पाठ्यक्रम में इसे शामिल करने का फैसला किया है.
हाइफा नगर निगम ने हाल ही में एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया, जिसमें प्रथम विश्व युद्ध के दौरान शहीद हुए भारतीय सैनिकों को श्रद्धांजलि दी गई. इस मौके पर इज़राइल में भारत के राजदूत और शहर के मेयर योना याहाव सहित कई अधिकारी मौजूद थे. कार्यक्रम का आयोजन हाइफा युद्ध की 107वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में किया गया.
स्कूलों में पढ़ाया जाएगा भारत का योगदान
हाइफा के मेयर ने घोषणा की कि अब स्थानीय स्कूलों के इतिहास पाठ्यक्रम में यह बदलाव किया जाएगा कि हाइफा को अंग्रेजों ने नहीं, बल्कि भारतीय सैनिकों ने मुक्त कराया था. उन्होंने कहा कि वर्षों तक उन्हें यही सिखाया गया कि ब्रिटिश सेना ने शहर को आज़ाद कराया, लेकिन अब ऐतिहासिक प्रमाणों से यह स्पष्ट हो गया है कि यह भारतीय रेजिमेंट्स की वीरता का परिणाम था.
इतिहास की सबसे तेज घुड़सवार विजय
हाइफा की लड़ाई को 20वीं सदी के अंतिम प्रमुख घुड़सवार अभियानों में से एक माना जाता है. 23 सितंबर 1918 को जोधपुर, मैसूर और हैदराबाद लांसर्स की रेजिमेंट्स ने घोड़ों पर सवार होकर भालों और तलवारों के साथ माउंट कार्मेल की कठिन पहाड़ियों को पार किया और तुर्की सेनाओं को पीछे हटने पर मजबूर किया. यह रणनीतिक और साहसिक विजय विश्व सैन्य इतिहास में एक अनोखी मिसाल है.
मेजर दलपत सिंह के नेतृत्व में हमला
इस ऐतिहासिक युद्ध का नेतृत्व जोधपुर रियासत के सेनापति मेजर दलपत सिंह ने किया था. उनके आदेश पर भारतीय सैनिकों ने दुश्मन की बंदूकें, तोपें और मशीनगनों के सामने परंपरागत हथियारों से मुकाबला किया. इस दौरान लगभग 900 भारतीय सैनिकों ने वीरगति पाई, लेकिन अंततः उन्होंने हाइफा पर नियंत्रण स्थापित कर लिया. इससे ओटोमन साम्राज्य का 400 साल पुराना शासन समाप्त हो गया.
प्रथम विश्व युद्ध में भारतीय बलिदान
भारत के 74,000 से अधिक सैनिकों ने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अपने प्राण न्योछावर किए थे, जिनमें से लगभग 4,000 जवान पश्चिम एशिया में शहीद हुए. हाइफा की लड़ाई उन बलिदानों में एक विशिष्ट उदाहरण है, जो भारत और इज़राइल के बीच आज भी मजबूत मित्रता का आधार बना हुआ है.
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