ईरान एक बार फिर गहरे राजनीतिक और सामाजिक संकट के दौर से गुजर रहा है. बेकाबू महंगाई, कमजोर होती अर्थव्यवस्था और रोजमर्रा की जरूरतों की बढ़ती कीमतों ने आम लोगों का जीना मुश्किल कर दिया है. हालात ऐसे बन गए हैं कि जनता अब सीधे इस्लामिक शासन के खिलाफ सड़कों पर उतर आई है. अयातुल्ला अली खामेनेई के नेतृत्व वाली सत्ता को चुनौती देते हुए देश के कई बड़े शहरों में बीते कई हफ्तों से लगातार विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं. तेहरान से लेकर इस्फहान, मशहद, शिराज और कोम तक गुस्से की लहर फैल चुकी है. प्रदर्शनकारियों के नारों में शासन के प्रति गहरा आक्रोश साफ झलक रहा है, जहां “खामेनेई मुर्दाबाद” और “मुल्लाओं को देश छोड़ना होगा” जैसी आवाजें सुनाई दे रही हैं.
ईरानी सरकार इन प्रदर्शनों को जनआंदोलन मानने से साफ इनकार कर रही है. शासन का कहना है कि यह सब विदेशी ताकतों की साजिश का हिस्सा है, जिसका मकसद देश को अस्थिर करना है. वहीं दूसरी ओर, आम नागरिक इसे अपनी आवाज और हक की लड़ाई बता रहे हैं. खामेनेई के नेतृत्व वाली सरकार ने विरोध को दबाने के लिए सुरक्षा बलों को खुली छूट दे दी है. हाल ही में सर्वोच्च नेता ने चेतावनी भरे लहजे में कहा था कि “दंगाइयों को उनकी औकात दिखा दी जाएगी.” इसके बाद से ही कार्रवाई और तेज हो गई है.
हिंसा में बढ़ती मौतें, हजारों हिरासत में
न्यूज एजेंसी एसोसिएटेड प्रेस ने स्थानीय मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के हवाले से बताया है कि इन प्रदर्शनों के दौरान हिंसा में मरने वालों की संख्या बढ़कर कम से कम 35 तक पहुंच गई है. इनमें आम नागरिकों के साथ-साथ बच्चे और सुरक्षा बलों के जवान भी शामिल हैं. रिपोर्ट के अनुसार अब तक 1200 से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है. हालात की गंभीरता इस बात से समझी जा सकती है कि प्रदर्शन थमने के कोई संकेत नहीं दिख रहे हैं.
27 प्रांतों में फैला विरोध, सैकड़ों स्थानों पर प्रदर्शन
अमेरिका स्थित ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट्स न्यूज एजेंसी के मुताबिक ईरान के 31 में से 27 प्रांत इस आंदोलन की चपेट में हैं. करीब 250 से अधिक स्थानों पर लोग सड़कों पर उतर चुके हैं. एजेंसी का दावा है कि अब तक 29 प्रदर्शनकारी, 4 बच्चे और सुरक्षा बलों के 2 जवानों की जान जा चुकी है. वहीं, इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स से नजदीकी रखने वाली फार्स न्यूज एजेंसी ने कहा है कि प्रदर्शनों में करीब 250 पुलिसकर्मी और बासिज फोर्स के 45 सदस्य घायल हुए हैं.
अमेरिका की चेतावनी, ईरान का पलटवार
ईरान में बढ़ती हिंसा ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भी हलचल मचा दी है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चेतावनी दी है कि अगर ईरानी सरकार शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर हिंसा जारी रखती है, तो अमेरिका उनकी मदद के लिए आगे आ सकता है. हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि अमेरिका सीधे हस्तक्षेप करेगा या नहीं, लेकिन ट्रंप के बयान के बाद हालात और तनावपूर्ण हो गए हैं. जवाब में ईरान ने मध्य पूर्व में तैनात अमेरिकी सैनिकों को निशाना बनाने की धमकी दी है. वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी के बाद यह बयान और ज्यादा संवेदनशील माना जा रहा है, क्योंकि मादुरो लंबे समय से तेहरान के करीबी सहयोगी रहे हैं.
2022 के बाद सबसे बड़ा जनआंदोलन
विशेषज्ञों के अनुसार यह 2022 के बाद से ईरान में सबसे व्यापक विरोध प्रदर्शन हैं. उस समय 22 वर्षीय महसा अमिनी की पुलिस हिरासत में मौत ने पूरे देश को झकझोर दिया था. हिजाब न पहनने के आरोप में हिरासत में ली गई अमिनी की मौत ने शासन के खिलाफ गुस्से को विस्फोटक रूप दे दिया था. मौजूदा हालात भी कुछ इसी तरह के हैं, जहां आर्थिक बदहाली ने चिंगारी का काम किया है. अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के सख्त होने और इजरायल के साथ हालिया संघर्ष के बाद ईरान की अर्थव्यवस्था बुरी तरह चरमरा गई है. दिसंबर में ईरानी मुद्रा रियाल का मूल्य गिरकर एक डॉलर के मुकाबले 14 लाख रियाल तक पहुंच गया, जिसके तुरंत बाद विरोध प्रदर्शनों ने जोर पकड़ लिया.
सूचनाओं पर पहरा, सच्चाई तक पहुंचना मुश्किल
इन प्रदर्शनों की वास्तविक व्यापकता का अंदाजा लगाना आसान नहीं है. ईरान में मीडिया पर सरकार का सख्त नियंत्रण है और विरोध प्रदर्शनों से जुड़ी खबरें सीमित रूप में ही सामने आ पा रही हैं. सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में कहीं धुंधली तस्वीरें दिखती हैं, तो कहीं गोलियों की आवाजें सुनाई देती हैं. पत्रकारों को रिपोर्टिंग के दौरान यात्रा की अनुमति, निगरानी, गिरफ्तारी और उत्पीड़न जैसी कई पाबंदियों का सामना करना पड़ता है. फिलहाल ईरान ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां जनता का गुस्सा, सत्ता की सख्ती और अंतरराष्ट्रीय दबाव—तीनों मिलकर हालात को और जटिल बना रहे हैं. यह देखना बाकी है कि यह आंदोलन किसी बड़े बदलाव की ओर बढ़ेगा या एक बार फिर दमन के साए में दबा दिया जाएगा.
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