मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच ईरान ने अंतरराष्ट्रीय परमाणु एजेंसी IAEA के साथ सहयोग पर विराम लगा दिया है. अमेरिकी और इजरायली हमलों के जवाब में उठाए गए इस कदम ने वैश्विक चिंताओं को और गहरा कर दिया है. ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने IAEA के साथ सभी प्रकार के सहयोग को तत्काल प्रभाव से निलंबित करने का आदेश दिया है.
हमलों के बाद बदला रुख, ईरान का बड़ा फैसला
13 जून 2025 को इजरायल द्वारा ईरान के परमाणु ठिकानों नतांज, इस्फहान और फोर्डो पर हवाई हमलों की शुरुआत हुई. इसके बाद 22 जून को अमेरिका ने भी हमले किए, जिन्हें राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को "नष्ट करने वाला कदम" बताया. इन घटनाओं के बाद 25 जून को ईरान की संसद ने भारी बहुमत (221-0) से एक प्रस्ताव पारित कर IAEA से सहयोग रोकने की मंजूरी दी. राष्ट्रपति का यह आदेश उसी प्रस्ताव का अगला कदम है, जिसे गार्जियन काउंसिल और सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल से भी हरी झंडी मिल चुकी है.
IAEA और ईरान: रिश्तों में गहराता अविश्वास
IAEA का कहना है कि ईरान ने 60% तक यूरेनियम संवर्धन कर लिया है. जो कि शांतिपूर्ण उद्देश्य से कई गुना अधिक है. एजेंसी की रिपोर्टों के अनुसार, ईरान इतने संवर्धित यूरेनियम के साथ कुछ ही हफ्तों में परमाणु बम बना सकता है. 12 जून 2025 को IAEA ने एक प्रस्ताव पारित करते हुए ईरान पर अपनी अंतरराष्ट्रीय परमाणु जिम्मेदारियों को न निभाने का आरोप लगाया और चेतावनी दी कि यह मामला संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद तक पहुंच सकता है.
ईरान का आरोप: IAEA पक्षपाती
ईरान का कहना है कि IAEA ने अमेरिका और इजरायल के हमलों की निंदा नहीं की, जिससे एजेंसी की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं. देश के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई ने भी बयान में कहा कि ईरान ने हमलों का "करारा जवाब" दिया है. IAEA के महानिदेशक राफेल ग्रॉसी ने ईरान के फैसले पर चिंता जताते हुए कहा कि इससे ईरान की परमाणु गतिविधियों की निगरानी करना और अधिक कठिन हो जाएगा.
वैश्विक प्रतिक्रिया और रणनीतिक खतरे
अमेरिका और इजरायल इसे अपने लिए बढ़ता खतरा मानते हैं. रूस और चीन ने IAEA की भूमिका को पक्षपाती बताया और ईरान की चिंताओं का समर्थन किया है. विशेषज्ञों का मानना है कि इस घटनाक्रम से ईरान परमाणु हथियारों के और करीब पहुंच सकता है, जिससे मध्य पूर्व में अस्थिरता और गहराएगी.
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