वो एक टैग.. और काम के प्रति लगन, जिसके कारण टूट गई जापान की पीएम की शादी

जापान की राजनीति इन दिनों एक बार फिर चर्चा में है—कारण हैं प्रधानमंत्री साने ताकाइची, जिन्होंने अपने कठोर अनुशासन और अथक परिश्रम से पूरे देश को हैरत में डाल दिया है. वह ऐसी नेता हैं जो वर्क-लाइफ बैलेंस जैसी अवधारणा को ही नकारती हैं.

Japan PM Takaichi Calls meeting at night 3 am
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जापान की राजनीति इन दिनों एक बार फिर चर्चा में है—कारण हैं प्रधानमंत्री साने ताकाइची, जिन्होंने अपने कठोर अनुशासन और अथक परिश्रम से पूरे देश को हैरत में डाल दिया है. वह ऐसी नेता हैं जो वर्क-लाइफ बैलेंस जैसी अवधारणा को ही नकारती हैं. हाल ही में उन्होंने सुबह तीन बजे एक लंबी मीटिंग बुलाकर जापान की राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था में नई बहस छेड़ दी. समर्थक उन्हें “आयरन लेडी” कह रहे हैं, जबकि आलोचक मानते हैं कि वह देश में “ओवरवर्क कल्चर” को और गहराई दे रही हैं.


ताकाइची ने यह मीटिंग संसद में बजट समिति की कार्यवाही से पहले रखी थी. इस सत्र में उन्हें संसद के कठिन सवालों के जवाब तैयार करने थे. उनका कहना है कि “काम की जरूरत को समय नहीं देखना चाहिए.” बैठक लगभग तीन घंटे तक चली और इसमें उनके तमाम वरिष्ठ अधिकारी मौजूद थे. जापान जैसे देश में, जहां प्रशासनिक कामकाज आमतौर पर सुबह आठ या नौ बजे शुरू होता है, ताकाइची की यह “तीन बजे की मीटिंग” बिल्कुल असामान्य थी. वह कहती हैं, “जब देश की तैयारी करनी हो, तो नींद को भी त्याग देना चाहिए.” लेकिन इस रवैये ने उनके आलोचकों को यह कहने का मौका दे दिया कि वह “करोशी” यानी ओवरवर्क से मौत की संस्कृति को और बढ़ावा दे रही हैं.

‘करोशी’ की छाया में जापान

जापान लंबे समय से एक ऐसे सामाजिक संकट से जूझ रहा है, जिसे स्थानीय भाषा में “करोशी” कहा जाता है—यानी अत्यधिक काम की वजह से मौत. 1980 के दशक में यह शब्द तब लोकप्रिय हुआ जब हजारों कर्मचारी लगातार काम करने के कारण दिल के दौरे या स्ट्रोक से मरने लगे. ताकाइची का “वर्क फॉर नेशन” मंत्र इस संस्कृति से गहराई से जुड़ा है. उनके विरोधी मानते हैं कि प्रधानमंत्री के रूप में उनका यह रवैया कर्मचारियों पर मानसिक और शारीरिक दबाव बढ़ा सकता है. वहीं उनके समर्थक कहते हैं कि वह जापानी अनुशासन और मेहनत की जीवंत मिसाल हैं, जिसने देश को बार-बार आर्थिक संकटों से उबारा है.

“वर्क हॉर्स” से “आयरन लेडी” तक का सफर

साने ताकाइची की छवि अचानक नहीं बनी. 1961 में नारा प्रिफेक्चर में जन्मी ताकाइची बचपन से ही अनुशासित और महत्वाकांक्षी रहीं. उनके पिता व्यापारी थे और घर में मेहनत को एक नैतिक मूल्य माना जाता था. युवावस्था में वह अमेरिका गईं, जहां उन्होंने कंज़र्वेटिव राजनीति से प्रेरणा ली. वापस लौटकर उन्होंने तय किया कि जापान को “अनुशासन और त्याग” की राह पर ही चलना चाहिए. 1980 के दशक में उन्होंने लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी के साथ राजनीति की शुरुआत की. पुरुष-प्रधान संसद में वह एक सख्त और सटीक महिला के रूप में उभरीं. उनके साथियों ने उन्हें जल्द ही “वर्क हॉर्स” कहना शुरू कर दिया. वह दिन में 18 घंटे तक काम करती थीं, बिना एक भी छुट्टी लिए.

निजी जीवन में अकेलापन, लेकिन राष्ट्र के लिए समर्पण

उनकी वर्कहोलिक प्रवृत्ति ने जहां उन्हें जापान की राजनीति में विशिष्ट स्थान दिया, वहीं व्यक्तिगत जीवन में अकेलापन भी ला दिया. उनकी शादी लंबे समय तक नहीं चल सकी. 2006 में उन्होंने एक बयान दिया था जिसने पूरे जापान में हलचल मचा दी थी—“मैंने परिवार नहीं चुना, क्योंकि मेरा परिवार अब मेरा देश है.” यह बयान कंजरवेटिव हलकों में त्याग का प्रतीक बन गया, लेकिन महिला संगठनों ने इसे “खतरनाक उदाहरण” बताया.

प्रधानमंत्री बनने के बाद और सख्त हुआ रूटीन

2025 में प्रधानमंत्री बनने के बाद ताकाइची का कार्यशैली और कठोर हो गई. वह अब अक्सर रात दो या तीन बजे मीटिंग बुला लेती हैं, सप्ताहांत में भी फाइलें देखती हैं, और कई बार खुद रिपोर्ट्स को हाथ से सुधारती हैं. वह कहती हैं, “प्रधानमंत्री थक नहीं सकता, देश का समय कभी नहीं रुकता.” उनका यह अनुशासन कुछ लोगों को प्रेरणा देता है, पर कई विशेषज्ञों को डर है कि इससे जापान के युवाओं में ओवरवर्क संस्कृति और गहराई तक पैठ सकती है.

विज्ञान और समाज दोनों दे रहे चेतावनी

वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि लंबे कार्य घंटे और मानसिक तनाव न केवल उत्पादकता घटाते हैं, बल्कि दिल की बीमारियों, स्ट्रोक और आत्महत्या के जोखिम को भी बढ़ाते हैं. 2014 के बाद जापान सरकार ने ओवरवर्क रोकने के लिए कई सख्त नियम बनाए—जैसे अधिकतम ओवरटाइम सीमा और अत्यधिक काम करने वालों के लिए अनिवार्य मेडिकल जांच. अध्ययन यह भी साबित करते हैं कि वर्क-लाइफ बैलेंस बेहतर होने से न केवल कर्मचारियों की सेहत सुधरती है, बल्कि उनकी रचनात्मकता और काम की गुणवत्ता भी बढ़ती है.

प्रेरणा या खतरा?

साने ताकाइची का जीवन जापान के लिए एक दर्पण की तरह है—जहां अनुशासन और मेहनत को पूजनीय माना जाता है, वहीं थकान और मानसिक स्वास्थ्य को अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है. वह आज भी कहती हैं कि “जापान को मेहनत से ही बदला जा सकता है,” लेकिन सवाल यह है कि अगर मेहनत की कीमत ज़िंदगी बन जाए, तो क्या यह सही दिशा है?

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