जापान की नई प्रधानमंत्री साने तकाइची के ताइवान पर दिए गए आक्रामक बयान के बाद पूर्वी एशिया का माहौल और ज्यादा तनावपूर्ण हो गया है. चीन इस वक्त कड़े रुख में दिख रहा है; ओसाका स्थित चीनी वाणिज्य दूत ने तकाइची को निशाना बनाते हुए “सिर काटने” जैसी कठोर भाषा तक इस्तेमाल की. इसके जवाब में जापान ने ताइवान की सुरक्षा को खुला समर्थन दिया है, जिससे बीजिंग असहज दिखाई दे रहा है.
स्थिति इस स्तर तक बिगड़ चुकी है कि चीन ने अपने नागरिकों को जापान यात्रा से परहेज़ करने की सलाह दी है. रक्षा विश्लेषकों का कहना है कि यदि यही माहौल बना रहा, तो दोनों देशों के बीच तनाव सीधा सैन्य मुकाबले तक पहुँच सकता है.
हालाँकि संख्याओं और हथियारों के लिहाज से चीन कहीं बड़ी शक्ति है—
इसके बावजूद जापान को हराना चीन के लिए आसान नहीं होगा, क्योंकि पाँच ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ टोक्यो बीजिंग पर भारी पड़ सकता है.
1. समुद्री युद्ध में जापान की महारत
जापान का सैन्य इतिहास बताता है कि वह समुद्र में जंग लड़ने में दुनिया की सर्वश्रेष्ठ ताकतों में रहा है. द्वितीय विश्व युद्ध में जापान ने एशिया में कई मोर्चों पर बड़ी सैन्य क्षमता का प्रदर्शन किया था और केवल अमेरिका ही वह राष्ट्र था जिसने उसकी ताकत को चुनौती दी.
आज भी जापान की समुद्री ताकत चीन से कम नहीं आँकी जाती. जापान के पास विश्वस्तरीय एंटी-सभमरीन वॉरफेयर (ASW) क्षमता है.
यदि चीन पूर्वी चीन सागर में हमला करता है, तो जापान की ASW क्षमता उसके लिए गंभीर चुनौती खड़ी कर सकती है. चीन की नौसेना भले आकार में बड़ी हो, लेकिन जापान की सटीकता और उच्च तकनीक उसकी प्रगति को धीमा कर सकती है.
2. रडार और टेक्नोलॉजी में जापान को बढ़त
इसके अलावा, टोक्यो का अमेरिका के साथ एक संयुक्त रक्षा समझौता भी है, जिसके अनुसार संघर्ष शुरू होते ही अमेरिका के रडार और इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म जापान की सेवा में आ जाएंगे. इससे चीन की मिसाइलों, ड्रोन और जहाजों की हर गतिविधि का रियल-टाइम पता चलेगा.
इस तकनीकी साझेदारी से जापान को एक ऐसे “रक्षा कवच” की सुविधा मिलती है जो चीन के पास नहीं है.
3. भौगोलिक स्थिति: जापान का रणनीतिक फायदा
भूगोल अक्सर युद्ध के समीकरण बदल देता है, और इस मामले में जापान बेहद मजबूत स्थिति में खड़ा है. जापान के नियंत्रण वाले क्षेत्र—
ये सभी ऐसे सामरिक पॉइंट हैं जिन्हें पार किए बिना चीन जापान के किसी मुख्य क्षेत्र तक नहीं पहुंच सकता. इन्हें समुद्र का “घेरा” कहा जाता है.
चीन की नौसेना को जापान के इन तटीय इलाकों से होकर ही उत्तर प्रशांत तक पहुंचना पड़ता है. ऐसे में जापान आसानी से चीन की नौसैनिक गतिविधियों को रोक या धीमा कर सकता है. यह वही क्षेत्र है जिसे सैन्य विशेषज्ञ “चोक पॉइंट” कहते हैं, जहाँ से गुजरना काफी जोखिम भरा और नियंत्रित होता है.
4. जापान-अमेरिका रक्षा संधि: चीन की बड़ी बाधा
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जापान ने अपनी सेना को सीमित कर दिया और अमेरिका ने उसके सुरक्षा संरक्षक की भूमिका संभाली. दोनों देशों के बीच मौजूद सुरक्षा संधि के तहत जापान पर किसी भी बाहरी हमले को अमेरिका पर हमला माना जाएगा.
यानी, युद्ध की स्थिति में—
चीन किसी भी हाल में अमेरिका से सीधा मोर्चा नहीं लेना चाहेगा. यही कारण है कि जापान के खिलाफ चीन का कदम उठाना राजनीतिक और सैन्य दोनों स्तरों पर अत्यंत जोखिम भरा है.
5. क्षेत्रीय गठबंधन: जापान के साथ कई देश
पूर्वी और दक्षिण-पूर्व एशिया में चीन की नीतियों से कई देश असहज हैं.
यदि चीन-जापान संघर्ष बढ़ता है, तो इन देशों का समर्थन टोक्यो को मिल सकता है, जिससे चीन पर कई दिशाओं से दबाव बढ़ जाएगा. विशेषकर ताइवान पहले से चीन के निशाने पर है और ऐसे किसी भी संघर्ष में जापान का स्वाभाविक साझेदार बन सकता है. दक्षिण चीन सागर में फिलिपींस और चीन की नौसेनाओं के बीच बार-बार टकराव भी बीजिंग की मुश्किलें बढ़ा सकता है.
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