Next Target Of US: वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो पर अमेरिकी सैन्य कार्रवाई और उनकी गिरफ्तारी के बाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल तेज हो गई है. इस घटनाक्रम ने दुनिया भर में एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है, क्या यह कार्रवाई सिर्फ वेनेजुएला तक सीमित रहेगी या फिर यह अमेरिका की व्यापक वैश्विक शक्ति विस्तार नीति का संकेत है?
डोनाल्ड ट्रंप के इस फैसले के बाद कई देशों में आशंका जताई जा रही है कि अमेरिका अब उन सरकारों के खिलाफ सीधे सैन्य हस्तक्षेप का रास्ता अपना सकता है, जो उसकी नीतियों या हितों से टकराती हैं. खास तौर पर ईरान में चल रहे प्रदर्शनों को अमेरिका का कथित समर्थन मिलने के बाद ये चिंताएं और गहरी हो गई हैं.
“अवैध तख्तापलट” या रणनीतिक दबाव?
ब्रिटिश अखबार गार्डियन की एक रिपोर्ट के अनुसार, कई अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों ने मादुरो की गिरफ्तारी को एक तरह का “अवैध तख्तापलट” बताया है. उनका तर्क है कि यह कार्रवाई न तो किसी स्थानीय न्यायिक प्रक्रिया के तहत हुई और न ही किसी अंतरराष्ट्रीय संधि या संयुक्त राष्ट्र की अनुमति के आधार पर, बल्कि सीधे सैन्य बल के जरिए अंजाम दी गई.
विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका ने इस कदम को ड्रग्स तस्करी और अवैध प्रवास जैसे मुद्दों से जोड़कर पेश किया, लेकिन इसके पीछे असली मकसद कहीं ज्यादा व्यापक है. इसे सैन्य, राजनीतिक और आर्थिक दबाव की उस नीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसके तहत अमेरिका यह संदेश देना चाहता है कि वह किसी भी देश में सत्ता परिवर्तन के लिए सीधे हस्तक्षेप करने से पीछे नहीं हटेगा.
क्या ईरान बन सकता है अगला बड़ा लक्ष्य?
वेनेजुएला के बाद जिन देशों का नाम सबसे ज्यादा चर्चा में है, उनमें ईरान सबसे ऊपर है. अमेरिका और ईरान के रिश्ते लंबे समय से तनावपूर्ण रहे हैं. कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रंप प्रशासन पहले ही ईरान के खिलाफ सख्त रुख अपना चुका है और हाल के दिनों में उस पर कड़ी निगरानी की बात भी सामने आई है.
मध्य पूर्व में ऊर्जा संसाधनों और सुरक्षा हितों को लेकर अमेरिका की चिंता किसी से छिपी नहीं है. ऐसे में आशंका जताई जा रही है कि अगर अमेरिका को लगता है कि उसके रणनीतिक या ऊर्जा हितों को सीधा खतरा है, तो वह ईरान के खिलाफ भी किसी बड़े कदम से पीछे नहीं हटेगा.
क्यूबा पर भी मंडरा रहा है खतरा
ईरान के अलावा क्यूबा भी अमेरिका की विदेश नीति में हमेशा एक संवेदनशील मुद्दा रहा है. क्यूबा ने कई बार आरोप लगाया है कि अमेरिका उसकी सरकार को कमजोर करने और सत्ता परिवर्तन के प्रयास करता रहा है.
वेनेजुएला संकट में क्यूबा द्वारा मादुरो सरकार को ऊर्जा और सैन्य सहयोग देने के कारण भी वह ट्रंप प्रशासन की नजर में आ गया है. क्यूबा का कहना है कि वेनेजुएला में जो हुआ, वह सिर्फ एक देश तक सीमित घटना नहीं है, बल्कि यह उस लंबे समय से चली आ रही नीति का हिस्सा है, जिसके तहत अमेरिका लैटिन अमेरिका में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है.
कोलंबिया की चिंता और ट्रंप की तीखी प्रतिक्रिया
लैटिन अमेरिका के ही एक और देश कोलंबिया ने भी अमेरिकी कार्रवाई पर गहरी चिंता जाहिर की है. कोलंबिया के राष्ट्रपति सहित कई दक्षिण अमेरिकी नेताओं ने कहा है कि वेनेजुएला पर हमला पूरे क्षेत्र की स्थिरता को खतरे में डाल सकता है.
उनका कहना है कि अगर अमेरिका का उद्देश्य केवल मादुरो को हटाना था, तो उसके लिए कूटनीतिक और आर्थिक दबाव जैसे कई अन्य विकल्प मौजूद थे. इसके बावजूद सैन्य हस्तक्षेप करना यह दिखाता है कि अमेरिका क्षेत्रीय संप्रभुता की परवाह किए बिना अपने फैसले थोपने को तैयार है.
कोलंबिया की आलोचना पर ट्रंप की प्रतिक्रिया भी कड़ी रही. उन्होंने कोलंबियाई नेतृत्व से कहा कि वे दूसरों पर सवाल उठाने से पहले अपने देश की स्थिति पर नजर डालें.
डेनमार्क और ग्रीनलैंड भी चर्चा में
अमेरिका की संभावित विस्तारवादी नीति की चर्चा सिर्फ एशिया या लैटिन अमेरिका तक सीमित नहीं है. यूरोप में भी इसको लेकर चिंताएं उभर रही हैं. डेनिश रक्षा खुफिया एजेंसी की एक हालिया रिपोर्ट में अमेरिका को केवल सहयोगी नहीं, बल्कि संभावित खतरे के रूप में भी देखा गया है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिका अब अपनी आर्थिक, तकनीकी और राजनीतिक ताकत का इस्तेमाल सिर्फ प्रतिद्वंद्वी देशों पर ही नहीं, बल्कि अपने पुराने मित्रों और सहयोगियों पर दबाव बनाने के लिए भी कर रहा है.
ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप के बयान इस चिंता को और बढ़ाते हैं. ट्रंप कई बार सार्वजनिक रूप से यह कह चुके हैं कि वे ग्रीनलैंड को अमेरिका का हिस्सा बनाना चाहते हैं. इस बयान ने डेनमार्क और अमेरिका के बीच कूटनीतिक तनाव पैदा कर दिया है. डेनमार्क ने साफ कहा है कि ग्रीनलैंड की संप्रभुता, लोकतांत्रिक अधिकार और जनता की इच्छा का सम्मान किया जाना चाहिए और किसी भी तरह का बाहरी हस्तक्षेप स्वीकार नहीं किया जाएगा.
क्या दुनिया एक नए दौर में प्रवेश कर रही है?
मादुरो की गिरफ्तारी के बाद यह साफ हो गया है कि अमेरिका अब अपनी विदेश नीति में ज्यादा आक्रामक और प्रत्यक्ष हस्तक्षेप का रास्ता अपना सकता है. सवाल यह नहीं है कि अमेरिका अगला कदम उठाएगा या नहीं, बल्कि यह है कि वह किस दिशा में और किस देश की ओर बढ़ेगा.
वेनेजुएला की घटना ने वैश्विक राजनीति में एक नई अनिश्चितता पैदा कर दी है, जहां हर वह देश जो अमेरिका की नीतियों से असहमत है, खुद को संभावित निशाने के रूप में देख रहा है.
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