मुंबई में हाल ही में एक डिलीवरी बॉय के साथ भाषा को लेकर हुए विवाद ने एक बार फिर महाराष्ट्र में भाषाई अस्मिता की बहस को हवा दे दी है. इस घटना ने न केवल सामाजिक स्तर पर प्रतिक्रिया उत्पन्न की, बल्कि राजनीतिक गलियारों में भी हलचल मचा दी है.
मराठी नहीं आती तो महाराष्ट्र छोड़ो
महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) प्रमुख राज ठाकरे ने इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया देते हुए एक विवादास्पद बयान दिया. उन्होंने सोशल मीडिया पर अपनी तस्वीर के साथ लिखा, “महाराष्ट्र मराठियों की धरती है. बाहर से आने वाले सिर्फ अपना पेट पालने के लिए यहां आते हैं. अगर उन्हें यहां रहना है, तो मराठी सीखनी होगी, नहीं तो यह धरती छोड़नी होगी.
Maharashtra is the land of only Marathi people! Migrants come only to feed their families, if they want to feed their families, they will have to learn Marathi. Otherwise, leave our land.#RajThackeray #Marathi #Maharashtra https://t.co/8LdabeCkMb pic.twitter.com/7DeJhYutq6
— Raj Thackeray (@raj4maharashtra) May 16, 2025
राज ठाकरे का यह बयान उस वीडियो के बाद आया, जिसमें MNS कार्यकर्ता एक डिलीवरी बॉय से कैमरे पर जबरदस्ती मराठी में माफी मंगवाते और मराठी सीखने का वादा करवाते नजर आ रहे हैं. वीडियो वायरल होते ही यह मुद्दा राजनीतिक और सामाजिक रूप से चर्चा का विषय बन गया.
भाषा संवाद का जरिया है, दीवार नहीं
राज ठाकरे के इस बयान पर सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं. कई यूज़र्स ने सवाल उठाए कि क्या यही नियम उन मराठियों पर भी लागू होगा जो देश के अन्य राज्यों में काम कर रहे हैं? एक आर्मी वेटरन ने टिप्पणी की, “तो क्या अब हर राज्य में यही फार्मूला लागू होगा? जहां जाओ, वही भाषा बोलो, नहीं तो बाहर जाओ?”
वहीं एक अन्य यूज़र ने लिखा, “राज्य किसी एक जाति या भाषा की जागीर नहीं होते. वे सबका होता है. कुछ ने इसे हिंदी थोपे जाने के विरोध में क्षेत्रीय भाषाओं की प्रतिक्रिया बताया, जबकि अन्य ने कहा कि भारत जैसे विविधता भरे देश में भाषा को हथियार बनाना देश की एकता के लिए खतरा है.
अस्मिता या राजनीति?
राज ठाकरे की टिप्पणी को कई लोगों ने मराठी अस्मिता के नाम पर राजनीतिक ध्रुवीकरण की कोशिश बताया है. विशेषज्ञों का मानना है कि यह बयान आगामी स्थानीय चुनावों और क्षेत्रीय राजनीति में बढ़त हासिल करने की रणनीति हो सकती है.
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