वेनेज़ुएला की विपक्षी नेता मारिया कोरीना मचाडो इन दिनों एक बार फिर चर्चा में हैं, लेकिन इस बार वजह कोई राजनीतिक बयान या प्रदर्शन नहीं, बल्कि उन्हें मिला नोबेल शांति पुरस्कार है. नोबेल कमेटी ने मचाडो को देश में लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण सत्ता परिवर्तन की कोशिशों के लिए यह सम्मान दिया है. हालांकि, इस फैसले के साथ ही राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तीखी बहस भी छिड़ गई है.
नोबेल कमेटी का कहना है कि मचाडो ने वेनेज़ुएला में विभाजित विपक्ष को एकजुट करने की दिशा में अहम भूमिका निभाई है और वे लोकतंत्र की बहाली के लिए शांतिपूर्ण रास्ता चुनने वाली नेता हैं. लेकिन उनके आलोचक इससे इत्तेफाक नहीं रखते. उनके अनुसार मचाडो की राजनीति अक्सर संघर्ष, विवादित विदेशी समर्थन, और विभाजनकारी बयानों से जुड़ी रही है.
अमेरिका समर्थक रुख पर विवाद
मारिया कोरीना मचाडो लंबे समय से अमेरिका समर्थक मानी जाती रही हैं. डोनाल्ड ट्रंप की वे प्रशंसक रही हैं और उनकी दोबारा चुनाव जीतने की इच्छा भी जाहिर कर चुकी हैं. इतना ही नहीं, नोबेल पुरस्कार मिलने के बाद मचाडो ने यह सम्मान भी ट्रंप को समर्पित कर दिया. यही नहीं, ट्रंप ने भी एक बार उन्हें "फ्रीडम फाइटर" बताया था.इस पर सवाल उठते हैं कि क्या अमेरिकी हस्तक्षेप का खुला समर्थन करने वाली नेता को 'शांति' के लिए सम्मानित किया जाना सही है, जबकि ट्रंप प्रशासन के दौरान वेनेज़ुएला में मानवीय संकट और प्रवासियों पर कठोर नीतियां सामने आई थीं.
लोकतांत्रिक या संघर्षप्रिय?
अपने राजनीतिक करियर में मचाडो ने कई बार चुनावों का बहिष्कार किया है और संवाद की प्रक्रिया से दूरी बनाई है. उनका यह मानना रहा है कि मादुरो सरकार को केवल विदेशी दखल से हटाया जा सकता है. ऐसे विचार उन्हें लोकतांत्रिक परंपराओं से दूर और कट्टरपंथी राजनीति के करीब लाते हैं.
नेतन्याहू का समर्थन और इजरायल विवाद
मचाडो पर इजरायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू का खुला समर्थन करने के आरोप भी लगे हैं, जिन पर फिलिस्तीन में जनसंहार जैसे गंभीर आरोप लगे हैं. मचाडो की यह अंतरराष्ट्रीय स्थिति कई लोगों को अखर रही है, जो मानते हैं कि नोबेल कमेटी ने बिना व्यापक सोच के यह फैसला लिया है.
पहले भी रहे हैं विवादित विजेता
यह पहली बार नहीं है जब नोबेल शांति पुरस्कार को लेकर विवाद खड़ा हुआ हो. इससे पहले हेनरी किसिंजर, मेनाचेम बेगिन और कई अन्य नेताओं को यह पुरस्कार मिला, जबकि उनके अतीत में हिंसक फैसले, युद्ध और विवादों की लंबी लिस्ट रही है.नोबेल कमेटी पर यह आरोप भी लगता रहा है कि वह कई बार पुरस्कार देकर राजनीतिक संकेत देना चाहती है, न कि सच्चे अर्थों में शांति स्थापित करने वालों को सम्मानित करना.
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