Pakistan Afghanistan Tension: अफगानिस्तान ने पिछले एक वर्ष में अपने व्यापार तंत्र में बड़ा बदलाव किया है. पाकिस्तान द्वारा बार-बार सीमा बंद करने और व्यापारिक दबाव बनाने की रणनीति के चलते तालिबान सरकार ने अपनी आर्थिक गतिविधियों को नए मार्गों की ओर मोड़ना शुरू कर दिया.
2024 के अंत से लेकर 2025 में अधिकांश समय तक तोर्खम और चमन जैसे प्रमुख बॉर्डर क्रॉसिंग बंद रहने से अफगानिस्तान के व्यापार को भारी नुकसान हुआ, लेकिन इसने काबुल को मजबूर किया कि वह पाकिस्तान पर लगभग पूर्ण निर्भरता से बाहर निकले और नए अवसर तलाशे.
बार-बार सीमा बंद होने से अफगान व्यापार को भारी नुकसान
पाकिस्तान ने कई बार सुरक्षा और प्रशासनिक कारणों का हवाला देकर सीमा पार व्यापार को अचानक रोक दिया, जिससे अफगान अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण सेक्टरों को बड़ा झटका लगा. फल, सब्ज़ियों और सूखे मेवों जैसे ताजा उत्पादों को भारी नुकसान झेलना पड़ा, क्योंकि ये सामान कई दिनों तक ट्रकों में फंसा रहता था.
सूखे मेवों से जुड़े अफगान कारोबारियों ने अनुमान लगाया कि उन्हें हर महीने लगभग 200 मिलियन डॉलर तक का नुकसान हो रहा था. इसके अलावा ईंधन, गेहूं, दवाइयां और अन्य आवश्यक वस्तुएँ लाने में होने वाली देरी ने स्थानीय बाज़ारों पर भी दबाव बढ़ा दिया. इस संकट ने तालिबान को मजबूर किया कि वह वैकल्पिक व्यापार मार्गों को तेज़ी से विकसित करे.
चाबहार पोर्ट ने अफगानिस्तान को दिया नया समुद्री दरवाज़ा
भारत द्वारा विकसित ईरान का चाबहार पोर्ट अब अफगानिस्तान के व्यापार का प्रमुख केंद्र बनता जा रहा है. यह बंदरगाह अफगानिस्तान को पाकिस्तान की समुद्री मार्ग पर निर्भरता से मुक्त करने की दिशा में बड़ा कदम साबित हुआ है. 2018 से सक्रिय यह पोर्ट अफगानिस्तान को सीधे भारतीय बंदरगाहों से जोड़ता है.
पिछले कुछ वर्षों में भारत की ओर से लगभग 1.5 मिलियन टन गेहूं और दालें चाबहार के माध्यम से अफगानिस्तान भेजी जा चुकी हैं. वहीं, अफगानिस्तान के अनार, अंगूर, सूखे मेवे और किशमिश अब भारतीय बाज़ारों तक पहले की तुलना में बहुत कम समय में पहुँचने लगे हैं. इससे अफगान किसानों और निर्यातकों दोनों को आर्थिक राहत मिली है.
भारत और मध्य एशिया के साथ बढ़ता संपर्क
तालिबान सरकार ने पाकिस्तान से दूरी बनाने के साथ-साथ भारत, उज़्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और कज़ाकिस्तान के साथ व्यापारिक संबंधों को मजबूत करने पर जोर दिया है. जुलाई से नवंबर 2025 के बीच हुए कई द्विपक्षीय दौरों में काबुल ने नई हवाई कार्गो उड़ानों, वीज़ा प्रक्रिया में तेजी और लॉजिस्टिक शुल्क कम करने के समझौतों को आगे बढ़ाया.
उत्तरी दिशा में स्थित उज़्बेकिस्तान के साथ हैरातन रेल टर्मिनल और तेरमेज ब्रिज के जरिए होने वाला व्यापार 1.1 बिलियन डॉलर तक पहुंच चुका है. 2025 में इसे बढ़ाकर 2 बिलियन डॉलर करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है. इससे मध्य एशिया के लिए अफगानिस्तान के दरवाजे और अधिक खुलते जा रहे हैं और क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग में तेजी आ रही है.
पाकिस्तान से व्यापार गिरकर 1 अरब डॉलर के नीचे
अक्टूबर 2025 में सीमा पर हुई हिंसक झड़पों के बाद पाकिस्तान ने तोर्खम और चमन दोनों क्रॉसिंग को अनिश्चितकाल के लिए बंद कर दिया. इसका सीधा असर दोनों देशों के द्विपक्षीय व्यापार पर पड़ा, जो पहले 2.5 अरब डॉलर से 3 अरब डॉलर के बीच रहता था. सीमा बंद होने के बाद यह व्यापार घटकर 1 अरब डॉलर से भी नीचे गिर गया.
पाकिस्तान में अफगान कृषि उत्पादों के दाम तेजी से बढ़ने लगे, क्योंकि वैकल्पिक आपूर्ति चैनल कमजोर थे. कई विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान की दबाव बनाने की नीति उलटी पड़ गई और उसने खुद ही अफगानिस्तान पर अपनी आर्थिक पकड़ ढीली कर दी.
तालिबान की नई नीति ने बदला क्षेत्रीय व्यापार समीकरण
अफगानिस्तान अब अपने व्यापार मार्गों को मल्टीपोलर मॉडल की दिशा में ले जा रहा है, जिसमें पाकिस्तान की भूमिका सीमित होती जा रही है. नए समुद्री और स्थलीय कनेक्शन न सिर्फ अफगान अर्थव्यवस्था को स्थिरता प्रदान कर रहे हैं, बल्कि उसे दक्षिण एशिया, मध्य एशिया और यूरोप तक विस्तृत नेटवर्क से जोड़ रहे हैं.
इस बदलते समीकरण ने क्षेत्रीय भू-राजनीति पर भी प्रभाव डाला है. जहां पाकिस्तान की आर्थिक leverage कमजोर हुई है, वहीं भारत और मध्य एशियाई देशों ने अफगानिस्तान में अपनी व्यापारिक उपस्थिति मजबूत कर ली है.