Exoplanet TOI-1422: जब हम रात के आसमान में तारों को देखते हैं, तो अक्सर सोचते हैं, क्या कहीं और भी हमारी तरह की दुनिया मौजूद है? क्या वहां भी सूरज जैसा कोई तारा है, जिसकी परिक्रमा करते ग्रहों पर जीवन बसता होगा? विज्ञान हर दिन इस सवाल का जवाब खोज रहा है. लेकिन इसी तलाश के बीच यूरोपीय खगोलविदों की एक टीम ने ऐसी खोज कर डाली है, जिसने हमारी पारंपरिक अंतरिक्ष समझ को ही चुनौती दे दी है.
पृथ्वी से 500 प्रकाश वर्ष दूर एक नया एक्सोप्लैनेट मिला है, TOI-1422 c. यह सिर्फ एक और दूर का ग्रह नहीं, बल्कि ऐसा आश्चर्य है जो हमारे सौर मंडल और ग्रह निर्माण के नियमों को सवालों के घेरे में खड़ा करता है.
TOI-1422 c: दिखने में पृथ्वी जैसा नहीं, लेकिन रहस्यमय जरूर
यह ग्रह आकार में पृथ्वी से तीन गुना बड़ा है, लेकिन वजन में 14 गुना भारी. यानी यह अपने आकार के मुकाबले विचित्र रूप से घना है, जो किसी भी सामान्य ग्रह में अपेक्षित नहीं होता. वैज्ञानिकों के लिए यह एक संकेत है कि ब्रह्मांड में ग्रहों की बनावट और विकास पृथ्वी-केंद्रित समझ से कई गुना अधिक जटिल हो सकते हैं.
यह नया ग्रह जिस तारे की परिक्रमा करता है, वह भी कम दिलचस्प नहीं. TOI-1422, जिसे TIC 333473672 भी कहा जाता है, हमारे सूरज की तरह ही उम्र, आकार और तापमान वाला तारा है, मानो ब्रह्मांड ने सूर्य का एक दूर का ‘कजन’ कहीं और बसा दिया हो. लेकिन उसके आस-पास मौजूद ग्रहों की संरचना बिल्कुल उलट-पलट है.
एक्सोप्लैनेट कैसे खोजे जाते हैं?
सौर मंडल के बाहर मौजूद ग्रह यानी एक्सोप्लैनेट सीधे दिखाई नहीं देते. वैज्ञानिक इन्हें उनके तारे की रोशनी में होने वाले बदलाव से खोजते हैं. जब कोई ग्रह तारे के सामने से गुजरता है, तो उसकी रोशनी थोड़ी सी कम हो जाती है. इस हल्की-सी डिमिंग को ट्रांज़िट मेथड कहते हैं. नासा का TESS मिशन इसी तकनीक से हजारों एक्सोप्लैनेट खोज चुका है और उसी ने TOI-1422 c का रहस्य भी खोला.
एक साल सिर्फ 34 दिन में, तारे के बेहद करीब चक्कर लगाता ग्रह
लुका नेपोनिएलो के नेतृत्व वाली टीम ने पाया कि यह ग्रह अपने तारे से सिर्फ 0.2 AU की दूरी पर स्थित है यानी पृथ्वी और सूर्य की दूरी का पांचवां हिस्सा. यह दूरी इतनी कम है कि इस ग्रह को अपने तारे का एक चक्कर लगाने में मात्र 34.5 दिन लगते हैं. यानी इस ग्रह पर एक साल सिर्फ एक महीने में खत्म हो जाता है. पहले वैज्ञानिकों ने इसकी कक्षीय अवधि 29 दिन मानी थी, लेकिन नई गणनाओं ने यह अनुमान गलत साबित कर दिया.
जहां तापमान इतना कि धातु तक पिघल जाए
TOI-1422 c का तापमान करीब 628 केल्विन है, इतना गर्म कि वहां सीसा (Lead) जैसी धातु भी तरल हो जाए. यह एक “सब-नेपच्यून” ग्रह है, पृथ्वी और नेपच्यून के बीच का आकार, लेकिन बेहद भारी और ठोस. इसकी घनत्व 4.3 g/cm³ है, जो इसे असामान्य रूप से कॉम्पैक्ट बनाती है.
बाहर वाला ग्रह भारी, अंदर वाला हल्का!
इस तारे के सिस्टम में पहले से मौजूद TOI-1422 b नाम का एक और ग्रह सिर्फ 13 दिनों में इसकी परिक्रमा करता है. लेकिन असल हैरानी ये है कि अंदर वाला ग्रह (b) आकार में बड़ा है, लेकिन वजन में हल्का. बाहर वाला ग्रह (c) आकार में छोटा है, लेकिन वजन में 50% ज्यादा भारी.
यह पैटर्न प्राकृतिक ग्रह निर्माण के सामान्य नियमों के बिल्कुल उल्टा है. वैज्ञानिक इसे Mass-Density Inverted System कह रहे हैं और ऐसा ब्रह्मांड में बहुत कम देखा गया है.
क्या सिस्टम में कोई तीसरा, ‘अदृश्य’ ग्रह भी छुपा है?
कहानी यहीं खत्म नहीं होती. अंदर वाला ग्रह TOI-1422 b अपने समय पर नहीं चल रहा, उसके ट्रांज़िट में बार-बार बदलाव दिख रहा है. इसे ट्रांज़िट टाइम वेरिएशन (TTV) कहा जाता है. यह बदलाव इतना ज्यादा है कि इसे TOI-1422 c नहीं पैदा कर सकता.
वैज्ञानिक मान रहे हैं कि यहां शायद एक तीसरा ग्रह भी मौजूद है, जो अभी तक दिखाई नहीं दिया है. एक 'भूतिया' ग्रह, जिसकी गुरुत्वाकर्षण खिंचाव से पूरी व्यवस्था अस्थिर हो रही है. नई रिसर्च arXiv में प्रकाशित हुई है और वैज्ञानिक अब इस तीसरे ग्रह की खोज पर ध्यान दे रहे हैं.
क्या हमारा सौर मंडल एक अपवाद है?
TOI-1422 का सिस्टम वैज्ञानिकों को यह सोचने पर मजबूर कर रहा है कि क्या ग्रहों के बनने के नियम हमारी कल्पना से कहीं ज्यादा विविध हैं? हो सकता है कि हमारा सौर मंडल असल में अपवाद हो, न कि नियम.
आने वाले समय में जेम्स वेब स्पेस टेलिस्कोप और TESS के आगे के मिशन इस “उलटे सौर मंडल” की और गहराइयों में झांकेंगे और शायद हमें दिखाएं कि ब्रह्मांड कितना अनोखा और रहस्यमय है.
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