बांग्लादेश में उलझी रही दुनिया और नेपाल में हो गया गेम! Gen-Z ने कर दिया अपने पीएम कैंडिडेट का ऐलान

दक्षिण एशिया में इस वक्त भले ही सबसे ज्यादा चर्चा बांग्लादेश की राजनीतिक अस्थिरता की हो, लेकिन असली हलचल नेपाल में दिखाई दे रही है.

Nepali Gen-Z announced PM candidate Balendra Shah Rabi Lamichhane
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दक्षिण एशिया में इस वक्त भले ही सबसे ज्यादा चर्चा बांग्लादेश की राजनीतिक अस्थिरता की हो, लेकिन असली हलचल नेपाल में दिखाई दे रही है. मार्च में होने वाले संसदीय चुनाव से पहले नेपाल की राजनीति में ऐसा गठजोड़ सामने आया है, जिसे बीते कई दशकों में सबसे बड़ा बदलाव माना जा रहा है. युवा नेतृत्व और सिस्टम के खिलाफ उभरी आवाज अब सीधे सत्ता की दावेदारी कर रही है.

नेपाल की राजधानी काठमांडू के मेयर और रैपर से नेता बने बालेन्द्र शाह, जिन्हें देशभर में ‘बालेन’ के नाम से जाना जाता है, अब राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के साथ आ गए हैं. इस पार्टी का नेतृत्व पूर्व टीवी एंकर और चर्चित चेहरा रबी लामिछाने कर रहे हैं. दोनों नेताओं की यह जोड़ी पारंपरिक राजनीतिक दलों के लिए सीधी चुनौती मानी जा रही है, जो लगभग तीन दशक से सत्ता पर बारी-बारी से काबिज रहे हैं.

चुनाव से पहले बड़ा ऐलान, पीएम फेस तय

पार्टी से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, रविवार को हुए समझौते में यह तय किया गया है कि यदि 5 मार्च को होने वाले चुनाव में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी जीत हासिल करती है, तो 35 वर्षीय बालेन्द्र शाह को प्रधानमंत्री पद का चेहरा बनाया जाएगा. वहीं 48 वर्षीय रबी लामिछाने पार्टी अध्यक्ष की भूमिका में बने रहेंगे.

दोनों नेताओं ने स्पष्ट किया है कि उनका एजेंडा सितंबर में हुए युवा आंदोलन के दौरान उठी मांगों को पूरा करना है. इन मांगों में भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कार्रवाई, जवाबदेह शासन और पुराने राजनीतिक ढांचे में बदलाव प्रमुख मुद्दे रहे हैं.

Gen-Z आंदोलन से बदली सियासत की दिशा

सितंबर में नेपाल में हुए जेन-Z नेतृत्व वाले विरोध प्रदर्शनों ने पूरे देश की राजनीति को झकझोर दिया था. इन प्रदर्शनों के दौरान हालात इतने बिगड़ गए कि 77 लोगों की जान चली गई और अंततः तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को इस्तीफा देना पड़ा.

इन आंदोलनों के दौरान बालेन शाह युवाओं के बीच एक मजबूत और प्रभावशाली चेहरे के रूप में उभरे. हालांकि उन्होंने खुद को आंदोलन का औपचारिक नेता घोषित नहीं किया, लेकिन सोशल मीडिया के जरिए उनकी पकड़ और असर साफ दिखाई दिया. युवा वर्ग में उन्हें सिस्टम बदलने वाले नेता के रूप में देखा जाने लगा.

क्या यह गठबंधन बनेगा गेम-चेंजर?

राजनीतिक विश्लेषक बिपिन अधिकारी का मानना है कि राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के लिए बालेन को साथ लाना एक बेहद रणनीतिक फैसला है. उनके मुताबिक, पारंपरिक दलों की सबसे बड़ी चिंता उनका युवा वोट बैंक है, जो तेजी से खिसक रहा है.

सितंबर के आंदोलन के बाद करीब 10 लाख नए मतदाता वोटर लिस्ट में जुड़े हैं और इनमें बड़ी संख्या युवाओं की है. कुल मिलाकर लगभग 1 करोड़ 90 लाख मतदाता इस चुनाव में अपने वोट का इस्तेमाल करेंगे. ऐसे में युवाओं का रुझान चुनाव के नतीजों को पूरी तरह बदल सकता है.

बालेन शाह न सिर्फ आंदोलन के दौरान युवाओं का भरोसा जीतने में सफल रहे, बल्कि अंतरिम सरकार के गठन में भी उनकी भूमिका अहम रही. पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की के नेतृत्व में बनी अंतरिम सरकार फिलहाल चुनाव प्रक्रिया की निगरानी कर रही है.

आलोचना भी कम नहीं

हालांकि बालेन की भूमिका को लेकर सवाल भी उठे हैं. कुछ आलोचकों का कहना है कि वह आंदोलन के दौरान सड़कों पर कम और सोशल मीडिया पर ज्यादा सक्रिय नजर आए. इसके बावजूद, युवा मतदाताओं के बीच उनकी लोकप्रियता में कोई कमी नहीं दिख रही.

रबी लामिछाने: लोकप्रिय लेकिन विवादों में

दूसरी ओर रबी लामिछाने भी नेपाल में किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं. 2022 के चुनाव से पहले उन्होंने राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी की स्थापना की थी. भ्रष्टाचार के खिलाफ उनके टीवी कार्यक्रमों ने उन्हें घर-घर में पहचान दिलाई.

हालांकि उन पर सहकारी संस्थाओं के फंड के कथित दुरुपयोग का मामला चल रहा है और वह फिलहाल जमानत पर हैं. इसके बावजूद, उनके समर्थक उन्हें व्यवस्था के खिलाफ खड़े होने वाले नेता के तौर पर देखते हैं.

पुराने दलों की बादशाहत को चुनौती

नेपाल की राजनीति में अब तक कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (यूएमएल) और नेपाली कांग्रेस का दबदबा रहा है. बीते 30 वर्षों में सत्ता इन्हीं दलों के इर्द-गिर्द घूमती रही है. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बालेन और लामिछाने की जोड़ी पहली बार इन दलों के सामने एक मजबूत वैकल्पिक राजनीतिक नैरेटिव पेश कर रही है.

हालांकि पारंपरिक दल इस गठबंधन को ज्यादा गंभीरता से लेते नजर नहीं आ रहे. नेपाली कांग्रेस के प्रवक्ता प्रकाश शरण महत ने दोनों नेताओं को विवादास्पद बताते हुए कहा कि इससे कोई बड़ा राजनीतिक उलटफेर नहीं होगा और मतदाता अब भी अनुभव को प्राथमिकता देंगे.

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