Indians In Yeman: यमन, दुनिया का एक ऐसा कोना, जहां ज़िंदगी हर रोज़ एक जंग है. बीते एक दशक से गृहयुद्ध, बेरोज़गारी, भूख, बीमारी और हिंसा से जूझता ये देश आज दुनिया के सबसे खतरनाक और अस्थिर इलाकों में गिना जाता है. लेकिन चौंकाने वाली बात ये है कि आज भी हजारों भारतीय इस संकटग्रस्त देश में रह रहे हैं, कुछ मजबूरी में, कुछ उम्मीद के साथ और कुछ जिम्मेदारी के तहत. यमन की जमीनी हकीकत जितनी डरावनी है, वहां रह रहे भारतीयों की कहानियां उतनी ही साहसी और भावुक हैं. खासकर केरल से आने वाली नर्सें जो इस युद्धभूमि जैसे माहौल में भी मरीज़ों की सेवा कर रही हैं, और अपने परिवारों की आर्थिक ज़रूरतें पूरी करने की कोशिश में दिन-रात जुटी हैं.
क्यों जाते हैं भारतीय यमन जैसे देश में?
भारत के दक्षिणी राज्यों, केरल, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश से बड़ी संख्या में युवा नर्सें और मेडिकल स्टाफ यमन में काम करने जाते हैं. इसका कारण भारत में कम वेतन, बेरोजगारी, कर्ज़, और एक बेहतर जीवन की तलाश होती है. यमन के निजी अस्पतालों में ₹40,000 से ₹65,000 (500–800 USD) तक मासिक वेतन मिल सकता है, जो भारत के छोटे शहरों से कहीं बेहतर है. उनके लिए यह सिर्फ नौकरी नहीं, बल्कि परिवार को सहारा देने और खुद को साबित करने का एक ज़रिया है, भले ही वो रास्ता जोखिमों से भरा हो.
कैसा है यमन में जीवन और सुरक्षा?
यमन की स्थिति बेहद जटिल है. पूरे देश में हिंसा फैली हो ऐसा नहीं है, लेकिन अधिकतर इलाके अस्थिर हैं. अडन, हुदैदा और मुकल्ला जैसे कुछ दक्षिणी क्षेत्र तुलनात्मक रूप से सुरक्षित माने जाते हैं, जहां निजी हॉस्पिटल्स और NGO आज भी विदेशी मेडिकल स्टाफ को काम पर रख रहे हैं. इसके बावजूद, सुरक्षा, बुनियादी सुविधाएं और मानसिक शांति जैसी चीज़ें यमन में आज भी दुर्लभ हैं. भारत सरकार ने कई बार वहां से अपने नागरिकों को निकाला है, लेकिन अब भी कुछ भारतीय वहां टिके हुए हैं, कुछ ने तो यमनी नागरिकता भी ले ली है.
एजेंट्स की चालबाज़ी और धोखा
कई बार युवाओं को यमन भेजने के पीछे झूठे वादों वाले एजेंटों का हाथ होता है. लोग समझते हैं कि उन्हें दुबई या सऊदी जैसी जगह भेजा जा रहा है, लेकिन वे पहुंचते हैं यमन जैसे युद्धग्रस्त देश में. यही कारण है कि निमिषा प्रिया जैसी घटनाएं सामने आती हैं, जिनमें सुरक्षा और जानकारी के अभाव ने ज़िंदगियां तबाह कर दीं.
यमन में भारतीय समुदाय
यमन में भारतीयों की मौजूदगी नई नहीं है. 19वीं सदी से ही गुजराती, मलयाली, तमिल और बोहरा मुस्लिम समुदाय यहां व्यापार और रोजगार के लिए बसते रहे हैं. ब्रिटिश शासन के दौर में अडन एक प्रमुख बंदरगाह था, जहां भारतीय व्यापारियों ने दुकानें, कारोबार और रिश्ते बनाए. आज भी यमन में कुछ सैकड़ों भारतीय स्थायी रूप से बसे हुए हैं, जिन्होंने यमनी नागरिकता ले ली है लेकिन अपनी भारतीय संस्कृति, भाषा और मूल्यों से जुड़े हुए हैं.
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