Pakistan and Afghanistan Clash: पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनाव और सीमा विवादों के बीच अब शांति की एक नई किरण दिखाई देने लगी है. तुर्किए की मध्यस्थता में दोनों देशों ने युद्धविराम बनाए रखने पर सहमति जताई है. यह समझौता ऐसे समय में हुआ है जब कुछ ही दिन पहले यह खबर आई थी कि इस्तांबुल में हुई शांति वार्ता असफल रही थी. लेकिन अब तुर्किए के विदेश मंत्रालय ने आधिकारिक तौर पर घोषणा की है कि दोनों देशों के प्रतिनिधिमंडल 6 नवंबर को फिर से बैठक करेंगे, ताकि युद्धविराम के अंतिम खाके पर मुहर लगाई जा सके.
तुर्किए, कतर, पाकिस्तान और अफगानिस्तान की ओर से जारी संयुक्त बयान में बताया गया कि सभी पक्ष अब एक ऐसे निगरानी और सत्यापन तंत्र (Monitoring & Verification Mechanism) को स्थापित करने पर सहमत हुए हैं, जो युद्धविराम के पालन पर नज़र रखेगा. इसके साथ ही यदि किसी पक्ष द्वारा समझौते का उल्लंघन किया जाता है, तो उस पर दंडात्मक कार्रवाई भी की जाएगी. तुर्किए के विदेश मंत्रालय ने कहा कि इस पहल का उद्देश्य दोनों देशों के बीच सीमावर्ती इलाकों में जारी तनाव को कम करना और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है. दरअसल, अक्टूबर की शुरुआत में सीमा पर दोनों पक्षों के बीच भीषण गोलीबारी हुई थी, जिसमें कई सैनिकों और नागरिकों की मौत हुई थी.
पिछली वार्ता रही थी नाकाम, अब उम्मीदें जागीं
पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच इससे पहले भी कई दौर की वार्ताएं हो चुकी हैं, लेकिन परिणाम हमेशा निराशाजनक रहे. पिछले दौर की बातचीत टूटने के बाद दोनों देशों के बीच बयानबाज़ी तो तेज़ हुई थी, मगर युद्धविराम की स्थिति बनी रही. हाल के दिनों में सीमा पर कोई नई झड़प दर्ज नहीं की गई है. हालांकि, स्थिति पूरी तरह सामान्य नहीं कही जा सकती, क्योंकि प्रमुख बॉर्डर क्रॉसिंग पॉइंट अब भी बंद हैं, जिससे दोनों ओर सैकड़ों ट्रक और शरणार्थी फंसे हुए हैं. व्यापार और मानवीय सहायता दोनों पर ही इसका असर पड़ा है.
पाकिस्तान का रुख और तुर्किए-कतर की भूमिका
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा मोहम्मद आसिफ ने एक स्थानीय चैनल से बातचीत में बताया कि शांति को एक और मौका देने का निर्णय कतर और तुर्किए के आग्रह पर लिया गया. उन्होंने कहा कि पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल को इस्तांबुल में ही रुकने के निर्देश दिए गए ताकि बातचीत को जल्द आगे बढ़ाया जा सके. पाकिस्तानी सरकारी मीडिया के अनुसार, इस वार्ता में पाकिस्तान का मुख्य जोर इस बात पर रहा कि अफगानिस्तान अपनी भूमि का इस्तेमाल आतंकवादी गतिविधियों के लिए न होने दे और पाकिस्तान तहरीक-ए-तालिबान (TTP) जैसे संगठनों पर कठोर कार्रवाई करे.
आतंकवाद पर पाकिस्तान की चिंता, अफगानिस्तान का इनकार
पाकिस्तान में पिछले कुछ महीनों में आतंकी हमलों में तेज़ी आई है, जिनके पीछे TTP को जिम्मेदार माना जा रहा है. इस्लामाबाद का दावा है कि 2021 में अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता वापसी के बाद से TTP को वहां शरण और समर्थन मिल रहा है. हालांकि, काबुल प्रशासन इस आरोप को खारिज करता आया है. अफगानिस्तान का कहना है कि वह अपने भूभाग का उपयोग किसी भी पड़ोसी देश के खिलाफ नहीं होने देगा. वहीं, विश्लेषकों का मानना है कि यह वार्ता दोनों देशों के लिए “विश्वास बहाली” का एक महत्वपूर्ण मौका है, क्योंकि अगर यह प्रयास सफल होते हैं तो दक्षिण एशिया में स्थिरता की दिशा में एक नई शुरुआत हो सकती है.
कूटनीतिक संतुलन और भविष्य की राह
तुर्किए और कतर की मध्यस्थता इस बात का संकेत है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस क्षेत्र की शांति के लिए गंभीर प्रयास जारी हैं. फिलहाल, दोनों पक्षों ने सकारात्मक रुख दिखाया है, लेकिन वास्तविक सफलता तभी मिलेगी जब सीमा पार आतंकवाद और अविश्वास की दीवारें गिरेंगी.विशेषज्ञों का मानना है कि यदि 6 नवंबर की बैठक में ठोस सहमति बनती है, तो यह दक्षिण एशिया में एक नई स्थायी शांति व्यवस्था की दिशा में अहम कदम होगा.
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