ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान की हुई थी कुटाई, ट्रंप के सामने 100 बार गिड़गिड़ाया... रिपोर्ट में खुलासा

झूठ और प्रोपेगेंडा ज्यादा समय तक टिक नहीं पाते, आखिरकार सच्चाई सामने आ ही जाती है.

Pakistan had pleaded with America to save itself from India
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झूठ और प्रोपेगेंडा ज्यादा समय तक टिक नहीं पाते, आखिरकार सच्चाई सामने आ ही जाती है. साल 2025 में ऑपरेशन सिंदूर को लेकर पाकिस्तान ने जिस तरह लगातार भ्रम फैलाने की कोशिश की थी, उस पर 2026 की शुरुआत में ही बड़ा पर्दाफाश हो गया है. अमेरिका में सार्वजनिक हुए आधिकारिक दस्तावेजों ने न सिर्फ पाकिस्तानी दावों की पोल खोल दी है, बल्कि डोनाल्ड ट्रंप के भारत-पाक मध्यस्थता के दावे को भी कमजोर साबित कर दिया है.

अमेरिका के फॉरेन एजेंट्स रजिस्ट्रेशन एक्ट (FARA) के तहत जारी ताजा दस्तावेजों से यह सामने आया है कि पहलगाम आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान ने ट्रंप प्रशासन से कम से कम 60 से 100 बार संपर्क कर भारत की सैन्य कार्रवाई से बचाने की गुहार लगाई थी.

सीजफायर के बाद भी घबराया पाकिस्तान

दस्तावेजों में यह भी दर्ज है कि 10 मई 2025 को सीजफायर की घोषणा के बाद भी पाकिस्तान की बेचैनी कम नहीं हुई थी. भारत की ओर से यह साफ किया गया था कि सीजफायर अस्थायी है और ऑपरेशन सिंदूर जारी रहेगा. इसके बाद पाकिस्तान और ज्यादा डर गया और अमेरिका में मौजूद अपने संपर्कों के जरिए भारत से बचाने की अपील करता रहा.

यानी जिस समय सार्वजनिक रूप से पाकिस्तान खुद को मजबूत दिखाने की कोशिश कर रहा था, उसी दौरान पर्दे के पीछे वह अमेरिका से लगातार मदद मांग रहा था.

FARA दस्तावेजों ने खोली पूरी कहानी

अमेरिका की प्रतिष्ठित लॉ फर्म स्क्वॉयर पैटन बोग्स ने FARA के तहत जो दस्तावेज अपलोड किए हैं, उनमें एक विस्तृत लॉग लिस्ट शामिल है. इस लिस्ट से पता चलता है कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तानी राजनयिकों और रक्षा अधिकारियों ने अपने अमेरिकी समकक्षों से ईमेल, फोन कॉल और बैठकों के जरिए 100 से अधिक बार संपर्क किया.

इन प्रयासों में न सिर्फ अमेरिकी सरकारी अधिकारियों से मुलाकात की मांग की गई, बल्कि बिचौलियों और अमेरिकी मीडिया से आमने-सामने की बैठकों की भी कोशिश की गई. FARA फाइलिंग यह भी दिखाती है कि पाकिस्तान ने वॉशिंगटन में कई लॉबी फर्मों के जरिए अमेरिकी सरकार के अलग-अलग विभागों तक पहुंच बनाई.

मदद के बदले सौदे की पेशकश

इन दस्तावेजों से यह भी खुलासा हुआ है कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख असीम मुनीर ने अमेरिका से मदद के बदले कई तरह की पेशकश की थी. इसमें अमेरिका में ज्यादा निवेश के अवसर, विशेष पहुंच (स्पेशल एक्सेस) और क्रिटिकल मिनरल्स तक पहुंच शामिल थी.

बाद में इन्हीं पेशकशों का जिक्र डोनाल्ड ट्रंप ने सार्वजनिक मंचों से कई बार किया, लेकिन इन दस्तावेजों ने यह साफ कर दिया कि ये प्रस्ताव पाकिस्तान की मजबूरी का नतीजा थे, न कि किसी बराबरी की कूटनीति का हिस्सा.

मध्यस्थता की असली सच्चाई

FARA दस्तावेजों में साफ तौर पर दर्ज है कि पाकिस्तान ने अमेरिका से भारत के साथ बातचीत करवाने और ऑपरेशन सिंदूर को रुकवाने के लिए मध्यस्थता की मांग की थी. यहां तक कि पाकिस्तान ने अमेरिकी मध्यस्थता की किसी भी कोशिश का “स्वागत” करने की बात कही थी.

इससे यह स्पष्ट हो गया कि अमेरिका से मध्यस्थता की मांग पाकिस्तान की ओर से की गई थी, भारत की ओर से नहीं. ऐसे में डोनाल्ड ट्रंप का यह दावा कि उन्होंने भारत-पाक के बीच मध्यस्थता करवाई थी, पूरी तरह कमजोर पड़ जाता है.

दस्तावेजों में क्या लिखा है

FARA फाइलिंग में दर्ज एक बयान के मुताबिक, पाकिस्तान ने 22 अप्रैल को पहलगाम में हुए आतंकी हमले की “स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच” की मांग की थी और इसमें अमेरिका की भूमिका का स्वागत किया था.

दस्तावेजों में यह भी कहा गया है कि पाकिस्तान भारत के साथ सिंधु जल संधि, आतंकवाद विरोधी मुद्दों और अन्य विवादों पर बातचीत चाहता है. इसमें यह भी जोड़ा गया कि अमेरिका को क्षेत्रीय आतंकवाद विरोधी सहयोग में शामिल किया जाना चाहिए और कोई तीसरा पक्ष दोनों देशों को भरोसेमंद समझौतों तक पहुंचाने में मदद कर सकता है.

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