अपने ही लोगों की जासूसी कर रहा पाकिस्तान! फ्रांस की यह कंपनी कर रही मदद, भारत के राफेल से है कनेक्शन

फ्रांस की रक्षा क्षेत्र की दिग्गज कंपनी थेल्स ग्रुप (Thales Group) एक बार फिर सुर्खियों में है, लेकिन इस बार वजह राफेल या युद्धपोत नहीं, बल्कि पाकिस्तान की मदद से जुड़ा एक विवाद है.

Pakistan is spying on its people with the help of a French company
प्रतिकात्मक तस्वीर/ ANI

फ्रांस की रक्षा क्षेत्र की दिग्गज कंपनी थेल्स ग्रुप (Thales Group) एक बार फिर सुर्खियों में है, लेकिन इस बार वजह राफेल या युद्धपोत नहीं, बल्कि पाकिस्तान की मदद से जुड़ा एक विवाद है. एक रिपोर्ट के अनुसार, यह बहुराष्ट्रीय एयरोस्पेस और डिफेंस कॉर्पोरेशन पाकिस्तान को लोगों की जासूसी करने वाले उपकरणों और तकनीकों में मदद कर रहा है.

जहां एक ओर थेल्स भारत को अत्याधुनिक राफेल लड़ाकू विमानों के लिए अहम उपकरण सप्लाई करती है, वहीं दूसरी ओर उसके नाम का जुड़ाव पाकिस्तान की घरेलू निगरानी और सेंसरशिप प्रणाली के साथ सामने आना कई सवाल खड़े करता है. क्या थेल्स अनजाने में भारत के सुरक्षा हितों को खतरे में डाल रही है?

थेल्स ग्रुप: जो रडार से राफेल तक बनाती है

थेल्स ग्रुप एक मल्टीनेशनल डिफेंस और एयरोस्पेस कंपनी है, जिसका मुख्यालय फ्रांस में है. यह कंपनी लड़ाकू विमानों, युद्धपोतों, ड्रोन, रडार, सैटेलाइट और साइबर सिक्योरिटी से जुड़े उपकरणों का निर्माण करती है.

यही कंपनी राफेल जेट्स के लिए कई महत्वपूर्ण तकनीकें विकसित करती है, जैसे कि:

  • RBE2 AESA रडार – राफेल को टारगेट खोजने और ट्रैक करने में मदद करता है.
  • स्पेक्ट्रा इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम – दुश्मन के हमले को भांपकर उससे बचाव करता है.
  • CNI सिस्टम (कम्युनिकेशन, नेविगेशन, आइडेंटिफिकेशन) – उड़ान के दौरान पायलट को जरूरी संचार और दिशा निर्देश प्रदान करता है.
  • कॉकपिट डिस्प्ले और हेलमेट माउंटेड डिस्प्ले – पायलट को वास्तविक समय की जानकारी उपलब्ध कराते हैं.

भारत ने फ्रांस से जो राफेल लड़ाकू विमान खरीदे हैं, उनमें थेल्स की यही तकनीकें लगी हैं. ऐसे में यदि वही कंपनी पाकिस्तान को निगरानी या साइबर स्पाइइंग तकनीक में मदद कर रही हो, तो भारत के लिए चिंता स्वाभाविक है.

एमनेस्टी इंटरनेशनल की चौंकाने वाली रिपोर्ट

एमनेस्टी इंटरनेशनल की एक विस्तृत रिपोर्ट – “Shadows of Control” ने इस पूरे मामले की परतें खोल दी हैं. रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान ने अपनी जनता की निगरानी और इंटरनेट पर सेंसरशिप के लिए जो सिस्टम बनाए हैं, उसमें अंतरराष्ट्रीय तकनीकी कंपनियों की एक गुप्त सप्लाई चेन शामिल है.

इस गुप्त नेटवर्क में शामिल हैं:

  • जर्मनी, फ्रांस, चीन, कनाडा, UAE और अमेरिका की टेक कंपनियां
  • और उन्हीं में से एक नाम थेल्स का भी है.

एमनेस्टी की रिपोर्ट बताती है कि पाकिस्तान के दो मुख्य निगरानी प्रोग्राम हैं:

  • Web Monitoring System (WMS) – इंटरनेट ट्रैफिक की निगरानी करता है
  • Lawful Intercept Management System (LIMS) – कॉल, मैसेज और डेटा की निगरानी करता है

इन दोनों सिस्टम्स की रीढ़ वे हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर हैं जो विदेशी कंपनियों से प्राप्त हुए हैं.

जासूसी फायरवॉल में इस्तेमाल हुई फ्रांसीसी तकनीक

पाकिस्तान ने हाल के वर्षों में चीन की GEEZ Networks के साथ मिलकर WMS 2.0 नाम का एक नया फायरवॉल सिस्टम तैयार किया है. यह सिस्टम चीन के कुख्यात "ग्रेट फायरवॉल" का एक एक्सपोर्ट वर्जन है, जिसे पाकिस्तान के लिए कस्टमाइज किया गया है.

इस सिस्टम में जो विदेशी तकनीकें इस्तेमाल हुई हैं, उनमें शामिल हैं:

  • Niagara Networks (अमेरिका) – नेटवर्क हार्डवेयर सप्लायर
  • New H3C Technologies (चीन) – सर्वर सप्लायर
  • Thales Group (फ्रांस) – लाइसेंसिंग और सिक्योरिटी मॉड्यूल्स

एमनेस्टी की रिपोर्ट के मुताबिक, यदि थेल्स के मॉड्यूल्स को इस सिस्टम से हटा दिया जाए, तो यह फायरवॉल काम ही नहीं करेगा. इसका मतलब है कि थेल्स की तकनीक इस निगरानी तंत्र का अभिन्न हिस्सा बन चुकी है.

पाकिस्तान का जासूसी नेटवर्क कैसे बना?

2018 तक पाकिस्तान का वेब मॉनिटरिंग सिस्टम कनाडा की कंपनी Sandvine द्वारा बनाए गए उपकरणों पर आधारित था. लेकिन बाद में इस कंपनी ने पाकिस्तान के साथ काम करना बंद कर दिया.

इसके बाद पाकिस्तान ने रुख किया चीन की ओर और चीन की सरकारी कंपनियों के सहयोग से एक नया और ज्यादा उन्नत निगरानी सिस्टम स्थापित किया गया. इसी सिस्टम में थेल्स ग्रुप का तकनीकी सहयोग भी जोड़ा गया.

इसके अलावा पाकिस्तान का दूसरा निगरानी प्रोग्राम, LIMS, जर्मन कंपनी Utimaco की तकनीक पर आधारित है. लेकिन इसे सीधे जर्मनी से न खरीदकर UAE की DataFusion नामक कंपनी के माध्यम से हासिल किया गया, ताकि पहचान को छुपाया जा सके.

विरोध की आवाज को दबाने में इस्तेमाल

इन निगरानी तंत्रों का उद्देश्य केवल साइबर सुरक्षा या आतंकी गतिविधियों पर नजर रखना नहीं है. रिपोर्ट यह भी बताती है कि इनका इस्तेमाल आम लोगों, पत्रकारों, एक्टिविस्ट्स और विरोधियों की निगरानी के लिए किया जा रहा है.

जो भी सरकार की नीतियों पर सवाल उठाता है, उसकी ऑनलाइन गतिविधियों को ट्रैक किया जा रहा है, कॉल्स को सुना जा रहा है और डेटा का इस्तेमाल दबाव बनाने के लिए किया जा रहा है.

इस तरह की तकनीकी व्यवस्था पाकिस्तान जैसे देश के हाथों में देना मूलभूत मानवाधिकारों के खिलाफ है, और इससे अंतरराष्ट्रीय कंपनियों की नैतिकता पर भी सवाल उठते हैं.

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