पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में पाकिस्तानी वायुसेना द्वारा की गई बमबारी ने देश के भीतर और बाहर तीखी प्रतिक्रिया को जन्म दिया है. इस हमले में लगभग 30 आम नागरिकों की जान चली गई, जिनमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल हैं. स्थानीय नागरिकों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने इसे मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन बताया है.
लेकिन बड़ा सवाल ये है कि पाकिस्तान की सेना ने आखिर इसी संवेदनशील क्षेत्र को क्यों चुना? क्या इसके पीछे कोई छिपा हुआ रणनीतिक या आर्थिक कारण है? और क्या अमेरिका, खासकर डोनाल्ड ट्रंप जैसे नेताओं की नजर भी इसी क्षेत्र के संसाधनों पर रही है?
खैबर पख्तूनख्वा कहां है और क्यों है इतना खास?
खैबर पख्तूनख्वा पाकिस्तान का उत्तर-पश्चिमी प्रांत है, जो अफगानिस्तान की सीमा से जुड़ा हुआ है. इसका सबसे महत्वपूर्ण भौगोलिक हिस्सा है खैबर दर्रा (Khyber Pass), जो ऐतिहासिक रूप से भारत और मध्य एशिया के बीच संपर्क का एक प्रमुख मार्ग रहा है.
भू-राजनीतिक दृष्टि से यह इलाका पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच एक रणनीतिक पुल (Strategic Bridge) की तरह है. और यही कारण है कि इस क्षेत्र पर कई ताकतों की नजरें टिकी हुई हैं.
प्राकृतिक संसाधनों का खजाना: तेल, गैस और खनिज
इस क्षेत्र का महत्व केवल भौगोलिक ही नहीं, बल्कि आर्थिक भी है. खैबर पख्तूनख्वा के कोहाट, बन्नू और करक जिले तेल और गैस के भंडार के लिए प्रसिद्ध हैं. यह अनुमान लगाया जाता है कि पाकिस्तान की लगभग 35-40% प्राकृतिक गैस इसी क्षेत्र से निकलती है.
करक जिले के लकी मरवत इलाके में कई सक्रिय तेल कुएं मौजूद हैं.
इसके अलावा, इस क्षेत्र में रेयर अर्थ मेटल्स यानी दुर्लभ खनिज तत्व भी पाए जाते हैं, जिनका उपयोग आधुनिक तकनीकी उपकरणों, मिसाइलों, बैटरियों और मोबाइल फोनों में होता है.
इन्हीं कारणों से यह क्षेत्र स्थानीय संघर्षों और अंतरराष्ट्रीय राजनीति का केंद्र बन गया है.
दुर्गम इलाका और आदिवासी प्रतिरोध
खैबर पख्तूनख्वा की भौगोलिक बनावट पहाड़ी, जटिल और दुर्गम है. यहां की आबादी मुख्य रूप से पश्तून समुदाय से संबंधित है, जो खुद को अफगानिस्तान के पख्तूनों से जुड़ा मानते हैं.
हालांकि, नागरिकों की मौत के चलते इन हमलों की वैधता पर सवाल उठाए जा रहे हैं.
डोनाल्ड ट्रंप और अमेरिका की दिलचस्पी
हाल ही में सोशल मीडिया और कुछ विश्लेषकों ने दावा किया कि पाकिस्तानी सेना इस इलाके के तेल और खनिज संसाधनों को डोनाल्ड ट्रंप या अमेरिकी कंपनियों को सौंपना चाहती है.
2016-2020 में ट्रंप ने राष्ट्रपति रहते हुए कहा था कि अमेरिका ने अफगानिस्तान और पाकिस्तान में खरबों डॉलर खर्च किए लेकिन कोई रणनीतिक लाभ नहीं मिला.
ट्रंप प्रशासन की नीति यह रही कि संसाधनों से भरपूर इलाकों में अमेरिकी निवेश किया जाए, जिससे अमेरिका को आर्थिक लाभ हो सके.
अमेरिकी थिंक टैंकों की रिपोर्ट्स में बार-बार इस क्षेत्र के तेल, गैस और खनिज संपदा का उल्लेख होता रहा है. इससे यह आशंका भी गहराई है कि अमेरिका, पाकिस्तान की सहमति से इस क्षेत्र में भविष्य में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से दखल दे सकता है.
क्या बमबारी का मकसद संसाधनों पर कब्जा है?
कई विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तानी सेना की यह कार्रवाई केवल आतंकियों के खिलाफ नहीं थी, बल्कि इसका असली उद्देश्य इलाके को सैन्य नियंत्रण में लेकर तेल-गैस संसाधनों पर कब्जा करना हो सकता है.
जब भी इस क्षेत्र में बमबारी होती है, उसके बाद अक्सर तेल कंपनियों या विदेशी प्रतिनिधियों की आवाजाही बढ़ जाती है.
सेना के लिए जनजातीय विरोध को कुचलना और क्षेत्र को सुरक्षित बनाना ज़रूरी है, ताकि निवेश और उत्खनन की प्रक्रिया आसान हो सके.
इसलिए यह आशंका निराधार नहीं है कि प्राकृतिक संसाधनों के लिए यह एक छिपा हुआ संघर्ष है.
भारत विरोधी आतंकी गतिविधियां बड़ी चिंता
खुफिया रिपोर्टों के अनुसार, जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा जैसे आतंकवादी संगठन इस क्षेत्र में नई छिपी हुई गतिविधियों को अंजाम दे रहे हैं.
यहां नए भर्ती केंद्र, हथियारों के भंडार और आतंकी प्रशिक्षण शिविर गुपचुप तरीके से संचालित हो रहे हैं.
चूंकि यह क्षेत्र भारत की सीमा से सटा नहीं है, लेकिन अफगानिस्तान के रास्ते भारत-विरोधी गतिविधियों की लॉजिस्टिक तैयारी का हिस्सा है, इसलिए भारतीय एजेंसियां भी सतर्क हो गई हैं.
संकेत मिल रहे हैं कि भविष्य में ये आतंकी संगठन इस क्षेत्र का उपयोग भारत के खिलाफ बड़े ऑपरेशन के लिए कर सकते हैं.
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