दमिश्क: एक दशक से भी अधिक समय तक चले गृहयुद्ध और लंबे समय से चली आ रही सत्तावादी शासन व्यवस्था के बाद, सीरिया में 14 साल बाद संसदीय चुनाव आयोजित किए गए हैं. यह चुनाव ऐसे समय पर हुए हैं जब देश राजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक संकट और सामाजिक विघटन के दौर से गुजर रहा है.
चुनावों को "लोकतंत्र की दिशा में पहला कदम" बताया जा रहा है, लेकिन आलोचक और अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक इसे सत्ता संरचना में महज़ एक नाममात्र परिवर्तन और वैधता की कवायद मान रहे हैं.
बशर अल-असद के युग का अंत
सीरिया लंबे समय से बशर अल-असद के नेतृत्व में तानाशाही शासन के अधीन था. हालांकि, दिसंबर 2024 में राजनीतिक तख्तापलट के बाद बशर की सत्ता समाप्त हो गई और अंतरिम राष्ट्रपति अहमद अल-शरा ने देश की कमान संभाली.
अहमद अल-शरा ने सत्ता में आते ही वादा किया था कि देश में लोकतांत्रिक परिवर्तन की प्रक्रिया शुरू होगी, जिसमें पारदर्शी और निष्पक्ष चुनाव कराए जाएंगे. लेकिन हालिया चुनावों की प्रक्रिया को देखकर यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या यह सच में लोकतंत्र की ओर बढ़ाया गया कदम है या फिर एक और सत्ताधारी की पकड़ मजबूत करने का जरिया?
जनता नहीं, 'चयनित प्रतिनिधि' ही वोटर
सीरियाई संसद में कुल 210 सदस्य होते हैं. इस बार हुए चुनाव में इनमें से केवल 140 सीटों के लिए वोट डाले गए. लेकिन यह मतदान आम नागरिकों द्वारा नहीं किया गया, बल्कि 7000 चयनित 'इलेक्टोरल कॉलेज' सदस्यों द्वारा किया गया. ये सदस्य खुद सरकार द्वारा नियुक्त जिला समितियों के माध्यम से नामित किए गए थे.
बाकी 70 सीटें अंतरिम राष्ट्रपति अहमद अल-शरा खुद नामित करेंगे. यानी, एक-तिहाई सांसदों की नियुक्ति बिना किसी चुनाव के सीधे राष्ट्रपति की पसंद से की जाएगी. इस तरह संसद में किसका वर्चस्व होगा, इसका अंदाज़ा आसानी से लगाया जा सकता है.
आम नागरिक चुनाव से बाहर
इन चुनावों को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि आम नागरिकों को इसमें कोई भागीदारी नहीं दी गई. न तो उन्हें वोट डालने का अधिकार मिला और न ही वे उम्मीदवार खड़े कर सके.
राजनीतिक दलों को भी इससे बाहर रखा गया. इससे चुनाव प्रक्रिया की वैधता और पारदर्शिता पर बड़े सवाल खड़े हो गए हैं.
सरकार का तर्क है कि गृहयुद्ध और बड़े पैमाने पर विस्थापन के चलते मतदाता सूची तैयार करना संभव नहीं था. करोड़ों लोग अब भी दस्तावेजों या पहचान पत्रों के बिना हैं. इसी वजह से आम चुनाव न कराकर सीमित प्रतिनिधियों के जरिए संसद चुनी गई है.
हालांकि, इस दावे पर भी अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों ने सवाल उठाए हैं. उनके मुताबिक अगर चुनाव का उद्देश्य लोकतंत्र को मजबूत करना है, तो जनता की भागीदारी सबसे ज़रूरी है, न कि उसे प्रक्रिया से बाहर रखना.
शरा की जीत पहले से तय
इन हालातों में अहमद अल-शरा की जीत पहले से ही सुनिश्चित मानी जा रही है. उन्हें संसद में दो-तिहाई से अधिक सीटों पर समर्थकों के आने की पूरी उम्मीद है, क्योंकि 70 सांसद तो वे खुद चुनेंगे और बाकी 140 सीटों पर मतदान करने वाले 7000 प्रतिनिधि भी सरकारी चयनित हैं.
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