De-Dollarization: रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने ऐसा बयान दे दिया है जिसने ग्लोबल अर्थव्यवस्था में हलचल मचा दी है. शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की मीटिंग में पुतिन ने खुलकर कहा कि अब रूस और SCO देशों के बीच होने वाला 97% व्यापार डॉलर में नहीं, बल्कि स्थानीय मुद्राओं में हो रहा है.
यह सिर्फ बयान नहीं, डॉलर की दशकों पुरानी पकड़ को चुनौती देने वाला कदम है. और इसके बीच भारत व चीन जैसे देश खुद को एक नए आर्थिक युग के केंद्र में खड़ा पा रहे हैं. सवाल यह भी है, क्या वास्तव में दुनिया डॉलर के खिलाफ एक शांत आर्थिक युद्ध में प्रवेश कर चुकी है?
डॉलर छोड़ो, अपनी मुद्रा अपनाओ
SCO प्राइम मिनिस्टर्स काउंसिल की बैठक में पुतिन ने जोर देकर कहा कि रूस अब डॉलर या यूरो पर निर्भर नहीं रहना चाहता. पश्चिमी देशों की पाबंदियों, बैंकिंग चैनलों की रोक और डॉलर ट्रांजैक्शन के बैन ने रूस को मजबूर किया कि वह व्यापार का नया रास्ता तलाशे. यही वजह है कि रूस अब अपने पार्टनर देशों के साथ रूबल, रुपये, युआन जैसी करेंसी में सौदे कर रहा है. पुतिन के इस बयान में एक संकेत छिपा है, भारत और चीन को अमेरिका के दबाव से मुक्त होकर स्वतंत्र आर्थिक रास्ता चुनने का दरवाज़ा खुल चुका है.
भारत और चीन को कैसे मिलेगा फायदा?
भारत रूस से बड़ी मात्रा में तेल, उर्वरक और रक्षा उपकरण खरीदता है. चीन रूसी गैस, तेल, खनिज और टेक्नोलॉजी का सबसे बड़ा खरीदार है. अब जब ट्रेड डॉलर में नहीं होगा, तो इन देशों को तीन बड़े लाभ दिख रहे हैं, डॉलर जुटाने का झंझट खत्म, पेमेंट तेजी से होगा, और अमेरिका के दबाव से धीरे-धीरे मुक्ति मिलेगी.
भारत के लिए यह मौका खास है, क्योंकि ऊर्जा पर उसकी निर्भरता लगातार बढ़ रही है. यदि भुगतान रुपये में होता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में रुपये की पकड़ मजबूत हो सकती है.
क्या जन्म ले रही है एक नई विश्व अर्थव्यवस्था?
दुनिया भर में डॉलर का वर्चस्व चुनौती में है. BRICS देश पहले ही डॉलर से दूरी बना रहे हैं. अब SCO में 97% ट्रेड स्थानीय मुद्राओं में हो रहा है. सऊदी अरब भी तेल बेचने के लिए डॉलर पर पूरी तरह निर्भर नहीं है.
पुतिन का कहना है कि SCO अपने खुद के पेमेंट सिस्टम और डिपॉजिटरी नेटवर्क पर काम कर रहा है, यानी भविष्य में SWIFT जैसा नया इंटरनेशनल पेमेंट सिस्टम दुनिया देख सकती है. यदि ऐसा होता है, तो ग्लोबल फाइनेंस की दिशा हमेशा के लिए बदल जाएगी.
भारत क्यों बनेगा इस बदलाव का सबसे बड़ा लाभार्थी?
रूस के साथ स्थानीय मुद्रा में व्यापार होने से भारत को सस्ती ऊर्जा की गारंटी मिल सकती है. डॉलर की कमी की चिंता खत्म होगी. रक्षा सौदे, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और भविष्य की रणनीतिक साझेदारी और आसान हो जाएगी. इस मॉडल का विस्तार भारत-ईरान, भारत-सऊदी और भारत-अफ्रीकी देशों के साथ भी संभव है. यह भारत की अंतरराष्ट्रीय आर्थिक पोज़िशन को नए स्तर पर ले जा सकता है.
रूस-भारत ट्रेड-क्या वाकई रुपये-रूबल में सौदे हो रहे हैं?
हाँ, रूस पहले ही भारत को रुपये में भुगतान का विकल्प दे चुका है. ऊर्जा सहित कई सौदों में अब डॉलर की जगह वैकल्पिक मुद्राओं का उपयोग बढ़ गया है. कुछ तकनीकी चुनौतियाँ अभी मौजूद हैं, लेकिन दिशा साफ है, स्थानीय मुद्राओं में ट्रेड भविष्य बन रहा है.
डॉलर से दूरी केवल आर्थिक फैसला नहीं, एक ग्लोबल राजनीतिक संदेश भी है. यदि दुनियाभर के देश डॉलर पर निर्भरता कम करते हैं तो अमेरिका की आर्थिक ताकत कमजोर होगी, डॉलर रिज़र्व की जरूरत घटेगी, और उसकी प्रतिबंध लगाने की क्षमता कमजोर पड़ जाएगी.
यह भी पढ़ें- त्योहारी रौनक ने बढ़ाई GDP की रफ्तार, दूसरी तिमाही में 7.5% ग्रोथ की उम्मीद; SBI रिपोर्ट में दावा