संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) ने ईरान पर परमाणु कार्यक्रम को लेकर फिर से प्रतिबंध लागू करने का फैसला किया है. इस प्रस्ताव का रूस और चीन ने पुरजोर विरोध किया था और ईरान के पक्ष में एक संयुक्त प्रस्ताव भी पेश किया, लेकिन यह प्रस्ताव खारिज कर दिया गया. इस निर्णय से ईरान के साथ-साथ उसके सहयोगी रूस और चीन को भी बड़ा झटका लगा है.
चीन और रूस ने मिलकर ईरान पर नए प्रतिबंधों को रोकने के लिए एक प्रस्ताव पेश किया था. लेकिन सुरक्षा परिषद में नौ देशों का समर्थन न मिलने की वजह से यह प्रस्ताव गिर गया. एनबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, यह फैसला अंतिम समय सीमा से एक दिन पहले आया, जिससे पश्चिमी देशों को एक बड़ी कूटनीतिक जीत मिली. रूस के उप राजदूत दिमित्री पोल्यान्स्की ने इस पर निराशा जताते हुए कहा कि पश्चिमी देश कूटनीति के बजाय दबाव की नीति अपना रहे हैं, जो स्थिति को और जटिल बनाएगा.
ईरान को होगा भारी नुकसान
इस निर्णय के बाद ईरान को कई स्तरों पर आर्थिक और सामरिक झटकों का सामना करना पड़ेगा. विदेशों में मौजूद ईरानी संपत्तियाँ ज़ब्त की जा सकती हैं. हथियारों की खरीद-फरोख्त पर रोक लगेगी. बैलेस्टिक मिसाइल कार्यक्रम पर कार्रवाई संभव है. ईरान के राष्ट्रपति डॉ. मसूद पेजेशकियन ने इस फैसले को “अन्यायपूर्ण और अवैध” बताया है. हालांकि उन्होंने यह भी साफ किया कि फिलहाल परमाणु अप्रसार संधि (NPT) से हटने का कोई इरादा नहीं है.
अमेरिका और यूरोप पर भड़का ईरान
ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने अमेरिका और यूरोपीय देशों पर कूटनीति को नजरअंदाज करने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि पश्चिमी देश बार-बार ईरान के परमाणु कार्यक्रम को हथियारों से जोड़कर गलत तरीके से पेश कर रहे हैं. जबकि ईरान हमेशा से दावा करता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण है. ईरान ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि अगर प्रतिबंध लगाए गए, तो वह अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) से सहयोग समाप्त कर देगा.
क्यों डर रहा है पश्चिम?
पश्चिमी देशों को आशंका है कि ईरान अब हथियार-योग्य यूरेनियम के संवर्धन के बहुत करीब पहुंच चुका है. हाल के महीनों में ईरान ने IAEA को परमाणु स्थलों तक पूरी पहुंच नहीं दी है. जून में इजरायल के साथ हुए संघर्ष के बाद यह स्थिति और तनावपूर्ण हो गई थी. इस संघर्ष में तेहरान के परमाणु स्थलों पर कथित बमबारी भी हुई थी. एक राजनयिक के अनुसार, निरीक्षक अभी भी ईरान में मौजूद हैं और फिलहाल वे देश नहीं छोड़ेंगे. लेकिन इन निरीक्षणों को पश्चिमी देश पर्याप्त नहीं मान रहे हैं.
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