Russia and Ukraine War: रूस-यूक्रेन युद्ध को दो साल से अधिक हो चुके हैं और दोनों देशों के बीच चल रही जंग अब तक किसी भी निर्णायक मोड़ तक नहीं पहुंच सकी है. इसी बीच, यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की ने एक बार फिर शांति वार्ता का प्रस्ताव रखा है, जिसमें उन्होंने तुर्की, खाड़ी देशों और यूरोप के कुछ देशों को संभावित मेज़बान के रूप में चिन्हित किया है. उनका मानना है कि यही देश वह मंच बन सकते हैं जहां दोनों पक्ष बातचीत के लिए तैयार हो सकें.
मंगलवार रात जारी अपने वीडियो संदेश में जेलेंस्की ने कहा कि इस सप्ताह वे उन देशों से संपर्क करेंगे जो रूस के साथ बातचीत की मेजबानी कर सकते हैं. उन्होंने कहा, “हमारी ओर से युद्ध खत्म करने की पूरी तैयारी है, लेकिन ज़रूरत है कि बात शुरू हो.” उल्लेखनीय है कि इस वक्त यूक्रेन की एक टीम कतर में है, जहां रक्षा मंत्री के साथ सुरक्षा मसलों पर चर्चा हो रही है. जेलेंस्की इससे पहले भी कई बार सीधे रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से बातचीत की पेशकश कर चुके हैं, लेकिन हर बार रूस ने यह कहकर वार्ता को टाल दिया कि कोई ठोस एजेंडा मौजूद नहीं है.
रूस का जवाब – पुराने रुख पर कायम
रूस की ओर से इस नई पहल पर कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं आई है. हालांकि, रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने पहले ही यह संकेत दिया था कि बातचीत तभी संभव है जब यूक्रेन "जमीनी हकीकतों" को स्वीकार करे – यानी रूस द्वारा कब्ज़ाए गए क्षेत्रों को विवाद से बाहर माने. रूसी मीडिया ने भी जेलेंस्की की इस पहल को "पुराना खेल" करार देते हुए इसे गंभीरता से नहीं लिया है.
पिछली कोशिशें क्यों नाकाम रहीं?
2022 में जब युद्ध की शुरुआत हुई थी, तब बेलारूस और बाद में तुर्की में शांति वार्ताएं हुई थीं. लेकिन दोनों देशों ने अपनी-अपनी मांगों से कोई समझौता नहीं किया. रूस लगातार कहता रहा कि वह अपने कब्ज़े वाले इलाकों से पीछे नहीं हटेगा, जबकि यूक्रेन की मांग है कि 2014 के बाद से जिन क्षेत्रों पर रूस ने नियंत्रण जमाया है, वे सभी वापस किए जाएं. यही गतिरोध अब तक किसी भी वार्ता को सफल नहीं होने दे रहा है.
तुर्की, खाड़ी और यूरोप – तीनों क्यों हैं अहम?
विशेषज्ञ मानते हैं कि जिन देशों का नाम जेलेंस्की ने लिया है, वे कूटनीतिक रूप से प्रभावशाली और रणनीतिक रूप से संतुलित माने जाते हैं. तुर्की: इससे पहले रूस-यूक्रेन अनाज डील और कैदी विनिमय जैसे कई महत्वपूर्ण समझौतों में मध्यस्थता कर चुका है. एर्दोआन की सरकार दोनों देशों के साथ संवाद में सहज है.
खाड़ी देश (कतर, सऊदी अरब): इन देशों के अमेरिका और रूस दोनों से अच्छे संबंध हैं. इनके पास आर्थिक ताकत के साथ-साथ कूटनीतिक लचीलापन भी है. यूरोपियन देश (फ्रांस, जर्मनी): ये देश शुरू से ही संघर्ष के समाधान की कोशिशों में शामिल रहे हैं. हालांकि रूस का मानना है कि यूरोप, अमेरिका के प्रभाव में काम करता है, इसलिए वह इस पर पूर्ण भरोसा नहीं करता.
पुतिन तैयार होंगे?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या व्लादिमीर पुतिन वाकई शांति वार्ता की मेज़ पर बैठना चाहेंगे? रूस की सैन्य स्थिति ज़रूर स्थिर लग रही है, लेकिन दबाव की स्थिति नहीं है कि वह तुरंत वार्ता की शर्तें माने. दूसरी तरफ, यूक्रेन की सरकार पूरी तरह पश्चिमी देशों की सहायता पर निर्भर है, जिससे उसकी मांगों में कोई नरमी नहीं दिख रही. "तुर्की शायद सबसे व्यावहारिक मंच बन सकता है, लेकिन पुतिन की मंशा सबसे बड़ी बाधा है."
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