सोचिए, जब कोई देश करोड़ों डॉलर खर्च करके एक हाईटेक डिफेंस सिस्टम खरीदता है, तो उसकी उम्मीदें आसमान छूती हैं. उसे लगता है कि अब उसकी सीमाएं सुरक्षित होंगी, दुश्मन की हर चाल नाकाम होगी. कुछ ऐसा ही सोचा था सऊदी अरब ने भी, जब उसने चीन से आधुनिक लेजर गाइडेड एयर डिफेंस सिस्टम खरीदा. लेकिन जब इसका टेस्टिंग समय आया, तो हकीकत बिल्कुल उलट निकली. नतीजा ये हुआ कि सऊदी अरब की सेना ने खुद इस सिस्टम को "महाघटिया" करार दे दिया.
यह घटना सिर्फ एक असफल रक्षा परीक्षण नहीं है, बल्कि चीन के हथियारों की साख पर एक बड़ा सवाल है. और यह भी बताता है कि क्यों तकनीक के नाम पर बड़े-बड़े दावे करना और युद्धभूमि में कारगर साबित होना दो अलग-अलग चीजें हैं.
क्यों खरीदा था सऊदी अरब ने चीन का लेजर सिस्टम?
सऊदी अरब दुनिया के उन गिने-चुने देशों में से एक था, जिसने चीन के स्काईशील्ड इंटीग्रेटेड एंटी-ड्रोन सिस्टम को चुना. इसके पीछे कारण था- बढ़ते ड्रोन हमलों का खतरा. खासकर जब ड्रोन झुंड बनाकर हमला करते हैं, तो पारंपरिक डिफेंस सिस्टम अक्सर असफल हो जाते हैं. ऐसे में चीन ने दावा किया था कि उसका लेजर आधारित यह सिस्टम न केवल ड्रोनों का पता लगा सकता है, बल्कि उन्हें हवा में ही खत्म भी कर सकता है.
इस सिस्टम में साइलेंट हंटर लेजर वेपन, ड्रोन डिटेक्शन रडार, जैमिंग व्हीकल्स, और कई अन्य अत्याधुनिक उपकरण शामिल थे. चीन ने इसे “नई पीढ़ी की सुरक्षा” बताया था. सऊदी ने फरवरी 2024 में इसे खरीदा, लेकिन 2025 में जब इसका ग्राउंड टेस्ट किया गया, तो नतीजे बेहद निराशाजनक निकले.
टेस्टिंग में क्यों बुरी तरह फेल हो गया चीनी सिस्टम?
सऊदी सेना ने जब इस डिफेंस सिस्टम को अपने देश की धरती पर टेस्ट किया, तो कई गंभीर खामियां सामने आईं. सबसे बड़ी दिक्कत आई रेगिस्तानी हालात में लेजर बीम की विफलता से. सऊदी के एक पूर्व सैन्य अधिकारी ने बताया कि वहां की धूल और रेत ने लेजर के ऑप्टिकल ट्रैकिंग सिस्टम को बेकार कर दिया. बीम की ताकत इतनी घट गई कि एक साधारण ड्रोन को गिराने में भी 15 से 30 मिनट तक का समय लग गया. सोचिए, इतने समय में दुश्मन का ड्रोन खुद उस डिफेंस सिस्टम को उड़ाकर चला जाए- यह कितना खतरनाक हो सकता है!
इसके अलावा, वहां की भीषण गर्मी ने सिस्टम की पावर कूलिंग को भी बुरी तरह प्रभावित किया. नतीजा यह हुआ कि साइलेंट हंटर लेजर जैसी प्रमुख तकनीकें ऑपरेशनल मोड में काम ही नहीं कर पाईं. कुल मिलाकर, यह पूरा डिफेंस सिस्टम युद्ध के मैदान के किसी काम का नहीं रहा.
चीन का दावा और हकीकत में जमीन-आसमान का फर्क
चीन ने इस लेजर सिस्टम को लेकर बड़े-बड़े दावे किए थे. स्काईशील्ड सिस्टम को एक कॉम्बिनेशन डिफेंस सिस्टम बताया गया था, जिसमें रडार ट्रैकिंग, इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग, और डायरेक्ट एनर्जी लेजर फायरिंग की सुविधा एक साथ दी गई थी.
हर एक यूनिट में चार विशेष व्हीकल शामिल थे, जिनमें 360 डिग्री कवरेज देने वाले रडार, ड्रोन जैमर और साइलेंट हंटर लेजर जैसे एडवांस सिस्टम शामिल थे.
लेकिन सऊदी में यह दावा पूरी तरह ढह गया. विशेषज्ञों ने कहा कि जिन क्षमताओं का डंका पीटा गया था, वो वास्तविक उपयोग के दौरान गायब थीं. यही नहीं, एक विशेषज्ञ ने यहां तक कहा कि चीन का यह सिस्टम उतना ही कमजोर निकला, जितना कि पाकिस्तान का एयर डिफेंस सिस्टम भारतीय हमलों के दौरान था.
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