इस्लामाबाद: पाकिस्तान इस समय एक बड़े सैन्य-सियासी संकट के मुहाने पर खड़ा है. 27वें संविधान संशोधन के लागू होने के बाद ऐसा माना जा रहा था कि देश में सेना की भूमिका और मजबूत हो जाएगी और इसी कड़ी में चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज (CDF) का नया पद बेहद शक्तिशाली बनकर उभरेगा. सेना प्रमुख असीम मुनीर को इस पद का सबसे संभावित दावेदार माना जा रहा था. लेकिन जैसे-जैसे नियुक्ति की तारीख नजदीक आई, सियासी समीकरण पूरी तरह बदलते नजर आने लगे. प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और उनके बड़े भाई नवाज शरीफ अब इस कदम का विरोध कर रहे हैं, जिससे मामला खुलकर सत्ता संघर्ष की दिशा में बढ़ गया है.
नए संशोधन के लागू होते ही रक्षा ढांचे में ऐसा परिवर्तन आया, जिसने नागरिक सरकार और न्यायपालिका की भूमिका को सीमित कर दिया. CDF का पद तीनों सेनाओं के एकीकृत नेतृत्व के रूप में स्थापित किया गया है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा, सैन्य रणनीति और कई ऑपरेशनल निर्णयों में अंतिम अथॉरिटी जैसा प्रभाव रख सकता है. इस कारण माना जा रहा था कि अगर असीम मुनीर को यह पद मिल गया, तो वे पाकिस्तान की सत्ता व्यवस्था में सबसे ताकतवर व्यक्ति बन सकते हैं.
शरीफ परिवार को मुनीर की बढ़ती ताकत से डर क्यों?
सूत्रों के मुताबिक, नवाज शरीफ ने साफ इशारा दे दिया है कि CDF की नियुक्ति से प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की शक्तियां लगभग औपचारिक होकर रह जाएंगी. नवाज ने अपने भाई को यह समझाने की कोशिश की कि सेना प्रमुख को इतनी विशाल शक्ति देने का मतलब होगा कि सरकार भविष्य में किसी भी अहम मुद्दे पर स्वतंत्र निर्णय नहीं ले सकेगी. इस चेतावनी का सीधा असर यह हुआ कि सरकार ने नियुक्ति प्रक्रिया धीमी कर दी.
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा है कि नवाज शरीफ पर्दे के पीछे से पूरी रणनीति नियंत्रित कर रहे हैं और वे किसी भी तरह मुनीर को देश का ‘सुपर चीफ’ बनने से रोकना चाहते हैं.
मुनीर को सेना प्रमुख पद से हटाने तक की चर्चा
स्थिति इतनी तनावपूर्ण हो चुकी है कि अब यह दावा भी किया जा रहा है कि शहबाज सरकार असीम मुनीर को उनके मौजूदा आर्मी चीफ के पद से हटाने की संभावनाओं पर भी विचार कर रही है. यह कदम बेहद जोखिम भरा माना जा रहा है, क्योंकि सेना के भीतर इस तरह के बदलावा से असंतोष बढ़ सकता है और पाकिस्तान एक बार फिर राजनीतिक अस्थिरता या सैन्य हस्तक्षेप जैसी स्थिति की ओर जा सकता है.
इमरान खान की गिरफ्तारी और उनकी कथित मौत की अफवाहों के दौरान बने असंतोष ने पहले ही सेना की छवि को नुकसान पहुंचाया है. ऐसे वातावरण में सरकार द्वारा सेना प्रमुख को हटाने की कोई भी कोशिश स्थिति को विस्फोटक बना सकती है.
मुनीर की नियुक्ति में देरी ने बढ़ाया संदेह
CDF की नियुक्ति का आदेश 29 नवंबर तक जारी होना था, लेकिन 1 दिसंबर तक सरकार ने कोई नोटिफिकेशन जारी नहीं किया. शहबाज शरीफ ने खुद को इस पूरी प्रक्रिया से दूर कर रखा है और यही चुप्पी अब पाकिस्तान में सबसे बड़ी राजनीतिक चर्चा का विषय बनी हुई है.
मुनीर का तीन साल का कार्यकाल 29 नवंबर को पूरा हो चुका है. नए आदेश की अनुपस्थिति ने उन्हें एक अनिश्चित श्रेणी में डाल दिया है, जहां वे तकनीकी रूप से आर्मी चीफ के पद पर बने तो हैं, लेकिन भविष्य स्पष्ट नहीं है. विपक्ष इसे शरीफ परिवार और सेना के बीच ठन चुकी जंग का संकेत बता रहा है.
क्या नवाज शरीफ की राजनीति दिखाएगी असर?
नवाज शरीफ अपने राजनीतिक करियर में ऐसे कई मौकों पर सेना के साथ संघर्ष में रहे हैं. इस बार भी वे खुलकर टकराव से बचते हुए पर्दे के पीछे से अपनी रणनीति चला रहे हैं. पाकिस्तान की राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि नवाज का मूल उद्देश्य सत्ता संतुलन को अपने पक्ष में रखना है और वह किसी भी कीमत पर सेना प्रमुख को पूर्ण शक्ति सौंपने के पक्ष में नहीं हैं.
कहा जा रहा है कि उन्होंने पार्टी नेताओं और पीएम शहबाज पर स्पष्ट दबाव डाला है कि मुनीर की नियुक्ति रोकना ही सरकार के भविष्य के लिए जरूरी है.
ये भी पढ़ें- श्रीलंका की बाढ़ में फंसा था पाकिस्तानी नागरिक, भारतीय वायुसेना ने 'ऑपेरशन सागर बंधु' में बचाई जान