उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर का एक गांव इन दिनों खूब चर्चा में है. गांव का नाम नियामतपुर है. दावा है कि इस गांव में पिछले 37 सालों से पुलिस ने केस सॉल्व नहीं किया. मसलन ग्रामीण आपसी बातचीत कर और पंचायती स्तर पर मसले का निपटान कर लेते हैं.
हालांकि हकीकत कुछ और बयां करती है. पुलिस अधीक्षक राजेश द्विवेदी ने भारत 24 की टीम को बताया कि नियामतपुर गांव में बीते वर्ष चार मुकदमे और इस वर्ष दो मुकदमे गंभीर धाराओं में दर्ज किए गए हैं. ऐसे में यह कहना कि गांव में पिछले 37 वर्षों से कोई रिपोर्ट दर्ज नहीं हुई, तथ्यों के विपरीत है.
अब तक कई मामले हुए दर्ज
उन्होंने बताया कि कुछ मीडिया प्लेटफॉर्म पर यह प्रचारित किया गया कि गांव में न तो कभी गोली चली और न ही कोई बड़ी वारदात हुई है तथा यहां लोग आपसी सहमति से विवाद सुलझा लेते हैं. हालांकि, वास्तविकता यह है कि नियामतपुर गांव में समय-समय पर मुकदमे दर्ज हुए हैं. करीब डेढ़ हजार आबादी वाले इस गांव को लेकर फैल रही भ्रामक खबरों पर पुलिस ने स्पष्ट किया है कि अपराध संबंधी सूचना दर्ज की जाती रही है और कानून के अनुसार कार्रवाई भी होती है.

क्या है झूठा दावा?
मिली जानकारी के अनुसार शाहजहांपुर में स्थित इस गांव में पिछले 37 सालों से न तो कोई विवाद थाने तक पहुंचा और न उनपर FIR दर्ज की गई है. रिपोर्ट्स में ये दावा किया जा रहा है कि ऐसा यहां सालों से होता आ रहा है. लेकिन हकीकत कुछ और ही. कई मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार पुलिस के पास कोई केस दर्ज नहीं हुआ न ही मामले ने अदालत की दहलीज लांघी है. लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं है.
कैसे सुलझता है मामला?
जब ये जानकारी सामने आई कि पुलिस इस गांव जाती ही नहीं तो सुनकर काफी हैरानी हुई. लोगों के मन में सवाल उठे कि आखिर मामले कैसे सुलझाए जाते हैं, तो आपको बता दें कि दावा किया गया हर मसले को ग्राम प्रधान या फिर वहां मौजूद बड़े बुजुर्ग ही मिलकर सुलझाते हैं. इससे न तो कोई कोर्ट की जरूरत पड़ती है और न ही पुलिस की. कहा गया कि इस प्रक्रिया से धन और समय की भी बचत होती है. लेकिन असलियत कुछ और ही है.
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